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ढाई की महिमा

*मैंने कभी पढा था* *"पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय,* *ढाई अक्षर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।। "* *बहुत अथक प्रयास के बाद अब पता लगा ये ढाई अक्षर क्या है-* *देखिये ढाई अक्षर👇* ✍️✍️ ढाई अक्षर के ब्रह्मा और ढाई अक्षर की सृष्टि। ढाई अक्षर के विष्णु और ढाई अक्षर की लक्ष्मी।  ढाई अक्षर के कृष्ण और  ढाई अक्षर की दुर्गा और ढाई अक्षर की शक्ति। ढाई अक्षर की श्रद्धा और ढाई अक्षर की भक्ति। ढाई अक्षर का त्याग और ढाई अक्षर का ध्यान। ढाई अक्षर की तुष्टि और ढाई अक्षर की इच्छा। ढाई अक्षर का धर्म और ढाई अक्षर का कर्म। ढाई अक्षर का भाग्य और ढाई अक्षर की व्यथा। ढाई अक्षर का ग्रन्थ और ढाई अक्षर का सन्त। ढाई अक्षर का शब्द और ढाई अक्षर का अर्थ। ढाई अक्षर का सत्य और ढाई अक्षर की मिथ्या। ढाई अक्षर की श्रुति और ढाई अक्षर की ध्वनि। ढाई अक्षर की अग्नि और ढाई अक्षर का कुण्ड। ढाई अक्षर का मन्त्र और ढाई अक्षर का यन्त्र। ढाई अक्षर की श्वांस और ढाई अक्षर के प्राण। ढाई अक्षर का जन्म ढाई अक्षर की मृत्यु। ढाई अक्षर की अस्थि और ढाई अक्षर की अर्थी। ढाई अक्षर का प्यार और ढाई अक्षर का युद्ध। ढाई अक्षर का मित्

रामचरित मानस : एक विशिष्ट जानकारी

*🏹रामचरित मानस के कुछ रोचक तथ्य🏹* 1:~लंका में राम जी = 111 दिन रहे। 2:~लंका में सीताजी = 435 दिन रहीं। 3:~मानस में श्लोक संख्या = 27 है। 4:~मानस में चोपाई संख्या = 4608 है। 5:~मानस में दोहा संख्या = 1074 है। 6:~मानस में सोरठा संख्या = 207 है। 7:~मानस में छन्द संख्या = 86 है। 8:~सुग्रीव में बल था = 10000 हाथियों का। 9:~सीता रानी बनीं = 33वर्ष की उम्र में। 10:~मानस रचना के समय तुलसीदास की उम्र = 77 वर्ष थी। 11:~पुष्पक विमान की चाल = 400 मील/घण्टा थी। 12:~रामादल व रावण दल का युद्ध = 87 दिन चला। 13:~राम रावण युद्ध = 32 दिन चला। 14:~सेतु निर्माण = 5 दिन में हुआ। 15:~नलनील के पिता = विश्वकर्मा जी हैं। 16:~त्रिजटा के पिता = विभीषण हैं। 17:~विश्वामित्र राम को ले गए =10 दिन के लिए। 18:~राम ने रावण को सबसे पहले मारा था = 6 वर्ष की उम्र में। 19:~रावण को जिन्दा किया = सुखेन बेद ने नाभि में अमृत रखकर। श्री राम के दादा परदादा का नाम क्या था? नहीं तो जानिये- 1 - ब्रह्मा जी से मरीचि हुए, 2 - मरीचि के पुत्र कश्यप हुए, 3 - कश्यप के पुत्र विवस्वान थे, 4 - विवस्वान के वैवस्वत मन

अक्षय तृतीया

आइए जानें अक्षय तृतीया का महत्व......!!!  शास्त्रों में अक्षय तृतीया को स्वयंसिद्ध मुहूर्त माना गया है। अक्षय तृतीया के दिन मांगलिक कार्य जैसे-विवाह, गृहप्रवेश, व्यापार अथवा उद्योग का आरंभ करना अति शुभ फलदायक होता है। सही मायने में अक्षय तृतीया अपने नाम के अनुरूप शुभ फल प्रदान करती है। अक्षय तृतीया पर सूर्य व चंद्रमा अपनी उच्च राशि में रहते हैं। इस वर्ष 2021 में अक्षय तृतीया 14 मई 2021 दिन शुक्रवार को होगी। तो आइए जानें 25 बातों से अक्षय तृतीया का महत्व... 1.“न माधव समो मासो न कृतेन युगं समम्। न च वेद समं शास्त्रं न तीर्थ गंगयां समम्।।” वैशाख के समान कोई मास नहीं है, सत्ययुग के समान कोई युग नहीं हैं, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं है और गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं है। उसी तरह अक्षय तृतीया के समान कोई तिथि नहीं है। 2 .अक्षय तृतीया के विषय में मान्यता है कि इस दिन जो भी काम किया जाता है उसमें बरकत होती है। यानी इस दिन जो भी अच्छा काम करेंगे उसका फल कभी समाप्त नहीं होगा अगर कोई बुरा काम करेंगे तो उस काम का परिणाम भी कई जन्मों तक पीछा नहीं छोड़ेगा। 3. धरती पर भगवान विष्णु ने 24 रूपों में अ

महत्वपूर्ण

*एक पठनीय आलेख* *अगर आपको पढ़ने से एलर्जी न हो तो समय निकालकर जरूर पढे़ं।*   *विद्वान* और *विद्यावान* में अन्तर *What is the difference between higly qualified & well qualified person?*       *विद्वान* व *विद्यावान* में अंतर समझना हो तो *हनुमान जी व रावण के चरित्र के अंतर को समझना पडे़गा।* आइए शुरू करते हैं श्री हनुमान चालीसा से। *तुलसी दास जी ने हनुमान को विद्यावान कहा , विद्वान नहीं।* *विद्यावान गुनी अति चातुर।* *राम काज करिबे को आतुर*॥ अब प्रश्न उठता है कि *क्या हनुमान जी विद्वान नहीं थे* ? जब वे विद्वान नहीं थे तो *वे विद्यावान कैसे हुए* ?? दोस्तों , विद्वान और विद्यावान में वही अंतर है जो *हाइली क्वालिफाइड ( उच्च शिक्षित ) और वेल क्वालिफाइड* ( सुशिक्षित ) लोगों में है। इन दोनों में *बहुत ही बारीक लेकिन महत्वपूर्ण अन्तर है।* उदाहरणार्थ *रावण विद्वान है और हनुमानजी विद्यावान हैं।* रावण के बारे में कहा जाता है कि उसके दस सिर थे। दरअसल यह एक प्रतीतात्मक वर्णन है। *चार वेद और छह: शास्त्र दोनों मिलाकर दस होते हैं। इन्हीं को दस सिर कहा गया है। जिसके सिर में ये दसों भरे हों , वही दसशी

नरक के द्वार

: कौन जाता है नरक :  ज्ञानी से ज्ञानी, आस्तिक से आस्तिक, नास्तिक से नास्तिक और बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति को भी नरक का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि ज्ञान, विचार आदि से तय नहीं होता है कि आप अच्छे हैं या बुरे। आपकी अच्छाई आपके नैतिक बल में छिपी होती है। आपकी अच्छाई यम और नियम का पालन करने में निहित है। अच्छे लोगों में ही होश का स्तर बढ़ता है और वे देवताओं की नजर में श्रेष्ठ बन जाते हैं। लाखों लोगों के सामने अच्छे होने से भी अच्छा है स्वयं के सामने अच्छा बनना। मूलत: जैसी गति, वैसी मति। अच्छा कार्य करने और अच्छा भाव एवं विचार करने से अच्छी गति मिलती है। निरंतर बुरी भावना में रहने वाला व्यक्ति कैसे स्वर्ग जा सकता है?   ये लोग जाते हैं नरक में : धर्म, देवता और पितरों का अपमान करने वाले, तामसिक भोजन करने वाले, पापी, मूर्छित, क्रोधी, कामी और अधोगा‍मी गति के व्यक्ति नरकों में जाते हैं। पापी आत्मा जीते जी तो नरक झेलती ही है, मरने के बाद भी उसके पाप अनुसार उसे अलग-अलग नरक में कुछ काल तक रहना पड़ता है।   निरंतर क्रोध में रहना, कलह करना, सदा दूसरों को धोखा देने का सोचते रहना, शराब पीना, मां

धन और धर्म

*धन* और *धर्म* में कौन *महान* है? ☆○☆○☆○☆○☆○☆○☆○☆○ *धन* की *रक्षा करनी* पड़ती है । *धर्म* हमारी *रक्षा* करता है । *धन का दुरुपयोग, या गलत मार्ग से अर्जित धन हमें दुर्गति* में ले जा सकता है । *धर्म निश्चित तौर पर हमें सद्गति* में ले जाता है । *धन* के लिए कभी-कभी/ जाने-अनजाने में हमसे *पाप कर्म* भी होता है । *धर्म* में *पाप का त्याग* होता है । *धन* से *धर्म* मिलने की  Guarantee नहीं है । *धर्म पालन* से सबकुछ (मुक्ति/ निर्वाण के लिए आवश्यक) प्राप्त होता है । *धन* मित्रों को भी *दुश्मन* बना देता है । *धर्म* दुश्मन को भी *मित्र* बना देता है । *धन* भय को *उत्त्पन्न* करता है । *धर्म* भय को *समाप्त* करता है । *धन* रहते हुए भी *व्यक्ति दुःखी* है । *धर्म* से व्यक्ति *दुःख मुक्त* होता हैं । *धन* से *संकीर्णता* आती है । *धर्म* से *विशालता* आती है । *धन* इच्छा को *बढ़ाता* है । *धर्म* इच्छाओं को *घटाते हुए नष्ट करता* हैं । *धन* में *लाभ-हानी* चलती रहती है । *धर्म* से हर समय *फायदा ही फायदा* है । *धन* से राग, द्वेष, अहंकार, व अन्य अनेक दुर्गुण *बढ़ सकते* हैं । *धर्म* से राग, द्वेष, अहंकार, व अन्य अनेक द

अलग दृष्टिकोण

*एक दृष्टिकोण ये भी,* *=राम राज्य का स्वरूप*= एक टक देर तक उस सुपुरुष को निहारते रहने के बाद बुजुर्ग भीलनी के मुंह से स्वर/बोल फूटे :- *"कहो राम !  सबरी की डीह ढूंढ़ने में अधिक कष्ट तो नहीं हुआ  ?"* राम मुस्कुराए :-   *"यहां तो आना ही था मां, कष्ट का क्या मोल/मूल्य ?"* *"जानते हो राम !   तुम्हारी प्रतीक्षा तब से कर रही हूँ, जब तुम जन्में भी नहीं थे|*    यह भी नहीं जानती थी,  कि तुम कौन हो ?  कैसे दिखते हो ?  क्यों आओगे मेरे पास ?    *बस इतना ज्ञात था, कि कोई पुरुषोत्तम आएगा जो मेरी प्रतीक्षा का अंत करेगा|* राम ने कहा :-  *"तभी तो मेरे जन्म के पूर्व ही तय हो चुका था, कि राम को सबरी के आश्रम में जाना है”|* "एक बात बताऊँ प्रभु !    *भक्ति के दो भाव होते हैं |   पहला  ‘मर्कट भाव’,   और दूसरा  ‘मार्जार भाव’*| *”बन्दर का बच्चा अपनी पूरी शक्ति लगाकर अपनी माँ का पेट पकड़े रहता है, ताकि गिरे न...  उसे सबसे अधिक भरोसा माँ पर ही होता है,   और वह उसे पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। यही भक्ति का भी एक भाव है, जिसमें भक्त अपने ईश्वर को पूरी शक्ति से पकड़े रहता है|  दिन र