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फ़िल्म समीक्षा :वीरे दी वेडिंग

फिल्म समीक्षा: वीरे दी वेडिंग
  यह एक  चर्चित फिल्म है एकता कपूर की और आज ही मैंने इसे देखा है ।इस फिल्म के बारे में बहुत सी सकारात्मक बातें हैं, बहुत से सकारात्मक सुखांत हैं। इसी के साथ - साथ इतने अधिक नकारात्मक चीजें हैं कि वह समाज के सामने यदि उतने  खुलेपन के साथ  आएंगी तो एक अराजकता के साथ, बुरी भावनाओं के सामने आने की संभावना अधिक बनी रहती है ।आज हमारा समाज जिन बुराइयों से जूझ रहा है, वह किसी भी प्रबुद्ध वर्ग से छुपी नहीं है। आज हम अपने युवा वर्ग को अच्छी शिक्षा ,अच्छे संस्कार, बेहतर मानवीय मूल्य, उन्नत सामाजिक मूल्य, यह सब देना चाहते हैं ,और यह हमारा कर्तव्य भी  है। क्योंकि यदि हम अपने इस पीढ़ी को यह सब नहीं देंगे तो  यही युवा वर्ग अपनी आने वाली पीढ़ी को  क्या हस्तांतरित करेंगे?
  सबसे पहले हम बात करते हैं सकारात्मकता की । क्योंकि समीक्षा समालोचना पर आधारित होती है।
इस फिल्म में दो भाइयों के आपसी झगड़े का अंत दिखाया गया है और ऐसा करने के लिए उनके  बच्चों  और उनके दोस्तों के द्वारा  उन्हें  प्रेरित किए जाता  है और वो दोनों पुराना सब कुछ भूल कर  पुन: एक हो जाते हैं । ये बहुत अच्छी …

त्रि युगी- भगवान विष्णु

आज एकादशी के उपलक्ष्य में एक सुंदर वृतांत।हुम सभी जानते हैं कि भगवान विष्णु को एकादशी तिथि कितनी प्रिय है। और श्री कृष्ण  विष्णु जी के ही अवतार हैं। एक सुंदर कथा ......
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरेभगवान विष्णु को त्रि - युग कहते हैं। वे तीन युगों -- सत्य, त्रेता तथा द्वापर में प्रकट होते हैं,  किन्तु कलियुग में नहीं होते,  लेकिन प्रह्लाद महाराज की स्तुतियों से समझ में आता है कि वे भक्त  के वेश में कलियुग में प्रकट होते हैं।
भगवान् चैतन्य ही वे भक्त हैं। किन्तु उन्होंने कभी इस भेद को प्रकट नहीं किया कि कृष्ण भक्त के रूप में प्रकट हुए हैं,  फिर भी रूप गोस्वामी ने उन्हें पहचान लिया,  क्योंकि भगवान् स्वयं को शुद्ध भक्त से छिपा नहीं पाते।
जब रूप गोस्वामी ने पहली बार भगवान् चैतन्य को नमस्कार किया तभी उनको पहचान गये थे।
वे जान गये कि भगवान् चैतन्य स्वयं श्री कृष्ण है,  अतः उन्होंने इन शब्दों में उनको प्रणाम किया,

*" मैं श्री कृष्ण की प्रार्थना करता हूँ जो अब भगवान् चैतन्य के रूप में प्रकट हुए हैं। "*
प्रह्लाद महाराज की स्तुतियों से भी…

हवन का महत्व

🔥 *हवन का महत्व* 🔥भारतीय संस्कृति में हवन का अत्यधिक महत्व है ।हवन शुभ कार्य, मांगलिक कार्यों के प्रारंभ  में किया जाता है एवं विशेष  समारोहों जैसे नवरात्रि, जन्म अथवा मृत्यु के समय भी किया जाता है। आज हम हवन के बारे में कुछ जानकारी प्राप्त करेंगे जो कि प्रामाणिक है।

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फ़्रांस के ट्रेले नामक वैज्ञानिक ने हवन पर रिसर्च की। जिसमें उन्हें पता चला की हवन मुख्यतः 👇आम की लकड़ी पर किया जाता है। जब आम की लकड़ी जलती है तो फ़ॉर्मिक एल्डिहाइड नामक गैस उत्पन्न होती है।जो कि खतरनाक बैक्टीरिया और जीवाणुओं को मारती है ।तथा वातावरण को शुद्द करती है। इस रिसर्च के बाद ही वैज्ञानिकों को इस गैस और इसे बनाने का तरीका पता चला।
गुड़ को जलाने पर भी ये गैस उत्पन्न होती है।
टौटीक नामक वैज्ञानिक ने हवन पर की गयी अपनी रिसर्च में ये पाया की यदि आधे घंटे हवन में बैठा जाये अथवा हवन के धुएं से शरीर का सम्पर्क हो तो टाइफाइड जैसे खतरनाक रोग फ़ैलाने वाले जीवाणु भी मर जाते हैं और शरीर शुद्ध हो जाता है।
हवन की महत्ता देखते हुए राष्ट्रीय वनस्पति अनुसन्धान संस्थान लखनऊ के वैज्ञानिकों ने भी इस पर एक रिसर्च क…

बलिदान का मूल्य

बलिदान का मूल्य
एक अतीव सुन्दरी युवती प्लेन ( हवाई जहाज ) पर चढ़ी औऱ बैठने के लिये अपनी सीट ढूंढने लगी। उसने पाया कि उसकी सीट एक ऐसे पुरूष के बगल में है जिसके दोनों हाथ नहीं थे।
उस खूबसूरत महिला ने विमान परिचारिका ( airhostess ) को बुलाया और कहा कि मैं इस व्यक्ति के बगल में नहीं बैठ सकती । मुझे एक बिना हाथों के व्यक्ति के साथ बैठकर यात्रा करना असुविधाजनक प्रतीत हो रहा है, अतः आप मेरी सीट बदल दें।
एयर होस्टेस ने पूछा " मैडम क्या में असुविधा का कारण जान सकती हूँ ?"
सुन्दर युवती बोली मुझे इस प्रकार के अंगहीन, लूले, लंगड़े व्यक्ति पसंद नहीं हैं। मुझे ऐसे व्यक्तियों के साथ यात्रा करना तो क्या थोड़ी देर बैठना भी पसंद नहीं है। यह सुनकर एयर होस्टेस को धक्का लगा, क्योंकि वह वह व्यक्ति देखने में और बातचीत में बड़ा ही सभ्य और सुसंस्कृत लग रहा था।
सुन्दर युवती ने पुनः दोहराया की मुझे इसके साथ नहीं बैठना है, आप मेरी सीट बदल दें।
एयरहोस्टेस ने युवती से कहा आप धैर्य रखें हम आपकी सुविधा हेतु हर सम्भव प्रयत्न करेंगे। उसने पूरा विमान देखा और पाया कि कोई सीट उपलब्ध नहीं है।
एयरहोस्टेस …

आदिवासी जीवन, लोकविश्वास और परंपराएं

आदिवासी जीवन, लोकविश्वास और परंपराएं। शोध सारांश -- आदिवासी जीवन से संबंधित किसी भी विषय पर, उनसे जुड़े किसी भी पहलू पर बात करने से पहले यह जान लेना आवश्यक है कि आदिवासी हैं कौन? उनकी पहचान क्या है? उनका जीवन, उनकी मान्यताएं ,उनकी परंपराएं ,उनकी आस्था, विश्वास, उनकी शिक्षा उनकी मातृभाषा, सभ्यता एवं संस्कृति आदि क्या है? या क्या रही होंगी ? इन सब के बारे में एक दृष्टिपात करना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि इन सब की जानकारी के बिना आदिवासी जीवन से संबंधित किसी भी बिंदु पर हम अपने विचारों के साथ न्याय नहीं कर पाएंगे। परिचय "आदिवासी" नाम से ही स्पष्ट है कि वे लोग जो इस धरती पर अनादि काल से विचर रहे हैं। ये प्राकृतिक मानव जा सकते हैं जो पूर्णतया प्रकृति पर ही आश्रित थे तथा आश्रित ही रह रहे हैं । ये समाज 21वीं शताब्दी के ज्ञान, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, शिक्षा ,आदि से अनभिज्ञ हैं।( परंतु धीरे-धीरे सरकार तथा निजी संगठनों की मदद से यह आदिवासी समाज आधुनिक संसार के साथ जुड़ने का प्रयास कर रहा है) यदि वास्तव में देखा जाए तो आदिवासी समाज ही है जो हमारी प्रकृति का, प्राकृतिक संपदा तथ…

प्रारब्ध

हम अक्सर कर्मों की बात करते हैं ।अपने दु:खों को ही सर्वोपरि मानते हैं । हम यह भूल जाते हैं इस पूरी पृथ्वी पर कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं है जिसे किसी भी प्रकार का कोई दुख ना हो। जो हमारे कर्म है वह हमें भोगने ही पड़ते हैं, यह अटल सत्य है। इसीलिए भगवान कृष्ण ने भी कर्म की प्रधानता हर जगह सिद्ध की है। एक छोटी सी कथा कि किस प्रकार हमारे कर्म हमारे सामने आते हैं और ईश्वर हमें किस तरह आलंबन देते हैं। इन सब अच्छी बातों का सांझा करने का सिर्फ एक ही मकसद है कि किसी भी तरह से हमारे विचार शुद्ध हो, हमारी भावनाएं विशुद्ध हो, एवं हमारे कर्म पवित्र हो ।यदि इससे किसी के भी मन में कुछ परिवर्तन होता है तो यही हमारी उपलब्धि है। कथा को ध्यान से  पढ़ना जरूरी है  ।       
                    *प्रारब्ध*    एक व्यक्ति हमेशा ईश्वर के नाम का जाप किया करता था । धीरे धीरे वह काफी बुजुर्ग हो चला था इसीलिए एक कमरे मे ही पड़ा रहता था ।     जब भी उसे शौच; स्नान आदि के लिये जाना होता था; वह अपने बेटो को आवाज लगाता था और बेटे ले जाते थे ।    धीरे धीरे कुछ दिन बाद बेटे कई बार आवाज लगाने के बाद भी कभी कभी आते और देर…