परीक्षा के दिनों का तनाव कुछ बातें कुछ सुझाव कुछ सुझाव

परीक्षा के दिनों का तनाव,
कुछ बातें, कुछ सुझाव।

परिचय--

आजकल का समय है स्कूल स्तर पर वार्षिक परीक्षाओं का। जिसे देखो वही एक  तरह के तनाव में है। चाहे वह बच्चे हो ,अध्यापक हो, या फिर अभिभावक ।क्योंकि यह वह समय है जब आप सबकी भी वार्षिक परीक्षा होती है, और इसका परिणाम भी शैक्षिक स्तर पर बहुत ही  मायने भी रखता है। इसलिए हमें इसे गंभीरता से तो लेना ही चाहिए, परंतु इतना भी नहीं  कि सिर्फ यही बाकी रह जाए।
यह बात हम सब जानते ही हैं कि "अति सर्वत्र वर्जयेत"।
एक शिक्षक और एक अभिभावक होने के नाते मैं यह कहना चाहती हूं कि केवल नंबर Marks मार्क्स से ही अपने बच्चों की प्रतिभा का आकलन ना करे। जिंदगी बहुत बड़ी है। हमें अपने बच्चों को ज्यादा तनाव नहीं देना चाहिए कि--- "आपने  इतने पर्सेंट नंबर लाने ही हैं चाहे कुछ भी हो जाए'।

हर बच्चे की अपनी क्षमता है, काबिलियत है। हमें उस क्षमता के अनुसार ही उन बच्चों को अभिप्रेरित करना चाहिए। यह बात कटु सत्य है कि हम अभिभावक अपने बच्चों को इतना तनाव दे देते हैं कि उन्हें परीक्षाओं से आसान "मौत" नजर आने लगती है ।चाहे वह खुद की हो या किसी और की। गुरुग्राम का प्रद्युम्न मर्डर केस इस बात का साक्षी है।

एक बार  कल्पना करके देखिए की जिस घर में किसी बच्चे की असामयिक मृत्यु हो जाती है  तो वहां उस परिवार का  क्या हाल होता होगा? यह बात सोच कर ही दिल  सिहर उठता है। भगवान ना करे कि कल को हमारे बच्चे के साथ ऐसा कुछ भी हो। फिर क्या करेंगे हम इन नंबरों का , इन सर्टिफिकेटस का ?

बच्चा ठीक है, जीवित है, खुश है, निरोगी है इससे अधिक और क्या चाहिए। मैं यह भी जानती हूं कि आजकल का जमाना प्रतियोगिता का है ।परंतु उसी के साथ - साथ   आज हर हुनर का भी ज़माना है । यदि आपके  बच्चे  में किसी भी प्रकार का कोई भी हुनर है तो आप उसे अपनी पहचान बना सकते हैं, उससे अपना नाम रोशन कर सकते हैं ,विश्व स्तर तक और अपनी आजीविका भी आसानी से चला सकते हैं ।जरूरत है तो सिर्फ अभिप्रेरणा की, हिम्मत की, सहयोग की और डेडिकेशन की। ईश्वर ने आज तक किसी भी इंसान को ऐसा नहीं बनाया है जिसमें कोई भी खूबी ना हो।

आजकल प्रधानमंत्री जी ने भी  कितनी योजनाएं युवाओं के लिए लॉन्च की है। यकीन मानिए आपका बच्चा भी कुछ ना कुछ अच्छा जरूर कर ही लेगा ।पर आपके लिए उस बच्चे  का  जीवन में बने रहना अत्यावश्यक है।

आजकल की इस दबाव भरी जिंदगी में जहां 80% बच्चे  खुद ही अपने करियर को लेकर इतने एक्टिव हैं, चिंतित हैं, तो हमें यह नहीं करना चाहिए कि हम उन पर और दबाव बनाए। इस विषय पर अभी नरेंद्र मोदी जी ने भी  एक पुस्तक लिखी है तथा विभिन्न प्रकार की सहायक संस्थाएं इस विषय पर काम सक्रियता से कर रहे हैं ।साइकोलॉजिस्ट्स  इन समस्याओं के चलते 24 ×7 की सुविधाएं उपलब्ध करवा रहे हैं क्योंकि यह समस्या बहुत गंभीर हो चुकी है ।अतः आप सब   इस समस्या को और गंभीर न बनने दें तथा इसमें यथाशक्ति अपना सहयोग प्रदान करें। हम सब लगभग इन सभी  बातों को जानते हैं। फिर भी मैं कुछ सुझाव देना चाहती हूं। शायद इसे अपना कर किसी एक बच्चे की भी  जिंदगी बच जाए तो उससे बढ़कर क्या चीज हो सकती है । "जीवन" से बड़ा कोई उपहार नहीं  हो सकता ।

सुझाव---

1 अत्यधिक प्रेशर ना ले , न हीं बच्चों को दें। बच्चे  जितना अधिक समय  स्वयं के लिए देंगे वही अच्छा है ।

2 दूर से ही मार्गदर्शन प्रदान करते हुए उनके खानपान  व आराम का ध्यान रखें एवं प्यार से उन्हें  अभिप्रेरित करें।

3 इस समय तक बच्चों ने  बहुत कुछ पढ़ लिया होता है। अत्यधिक नंबरों की होड़ में ना पड़े। जिंदगी सिर्फ नंबरों पर नहीं चलती।आप  अपने  बच्चे को एक अच्छा ज़िम्मेदार नागरिक बना कर भी बहुत कुछ हासिल कर सकते हैं।

4 हर बच्चा विशेष है और ईश्वर ने सबका भाग्य अलग-अलग लिखा है। अतः केवल कर्म करने  है और इमानदारी मेहनत के बल पर ही जो मिले वही मीठा फल है।

5 जिंदगी रही तो अवसर बहुत मिलेंगे ।

6 हमारा बच्चा, उसका बचपन, उसकी चंचलता, उसका विकास ,उसकी मुस्कान, उसका जीवन संरक्षण ही  हमारा ध्येय होना चाहिए।

7 प्रतियोगिता स्वयं से होनी चाहिए।

8 नैतिक चारित्रिक मानवीय गुणों का विकास करने का प्रयत्न करें।

9 उत्साहवर्धक, अभिप्रेरणात्मक, धार्मिक, नैतिक, चारित्रिक बल बढ़ाने वाली बातों का समावेश दैनिक जीवन में करें ताकि बच्चे अपने आप में एक अद्वितीय शक्ति का संचार महसूस कर सके एवं स्वस्थता एवं स्फूर्ति के साथ परीक्षाओं को मूर्त रूप दे सके।

10 जिस विषय का पेपर हो चुका है चाहे वह कैसा भी हुआ है उस पर अधिक ध्यान ना देते हुए अगले पेपर की तैयारी में लग जाए तो ज्यादा अच्छा है।

11 इन दिनों में बच्चों के साथ अधिक से अधिक समय बिताने का प्रयास करें ताकि उन्हें यह लगे कि हमारी तैयारी में हमारे अभिभावक भी पूरी तरह से सहयोगी हैं।Moral  support

12 छोटे-छोटे ब्रेक देते रहे ताकि बच्चे अपने आप को रीफ्रेश समझते रहे, मानते रहें।

13 पढ़ाई के बीच - बीच में आंवला, दूध और फल इत्यादि बच्चों को देते रहें ताकि इनसे बच्चों की स्मरण शक्ति और स्टैमिना पावर बढ़ती रहे ।

14 बच्चों को मानसिक स्तर पर स्वस्थ रखने का प्रयास करें, खुश रखने का प्रयास करें।

निष्कर्ष--

मैंने जो लिखा है वह सब बातें आप सब लोग जानते हैं ।परंतु फिर भी प्रयास करना हमारा काम है। हमसे पहले भी हर विषय पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है, लिखा जा रहा है तथा तथा हमारे बाद भी यह क्रम अनवरत जारी रहेगा। फिर भी यदि हमारे लेखन से किसी एक व्यक्ति के दिमाग पर भी सकारात्मक असर होता है तो हमारा लेखन, हमारे विचार, हमारी लेखनी सार्थक हो जाएगी क्योंकि---

" अंदाज ए बयां बना देता है, हर बात को और हंसी,

वरना इस दुनिया में, कोई बात नहीं बात नहीं"।

  शुभकामनाओं के साथ।

लेखिका
डॉ विदुषी शर्मा

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