साहित्य और मीडिया : वर्तमान संदर्भ में।

साहित्य और मीडिया : वर्तमान संदर्भ में

शोध सारांश----

साहित्य क्या है ? इसकी हमारे समाज में क्या उपयोगिता है ?और हमारे समाज के लिए यह क्या भूमिका निभा सकता है ?इसके बारे में शायद हम सब जानते हैं। "साहित्य समाज का दर्पण है"। वर्तमान संदर्भ में सोशल मीडिया का हर तरफ बोल बाला है जिसके कुछ नकारात्मक पक्ष तो है । परंतु यदि सोशल मीडिया के सकारात्मक पक्षों की बात करें तो इसकी नकारात्मकता नगण्य  हो जाती है। आज सोशल मीडिया द्वारा हम अपने प्राचीनतम इतिहास की जानकारी आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। हमारे वेद ,पुराण, श्रुतियां, उपनिषद, महाकाव्य, काव्य और जितने भी ग्रंथ हैं ,विभिन्न विषयों पर ऋषि मुनियों ने जिनकी रचनाएं की है ,उन सब की जानकारी हमें आज केवल एक क्लिक की दूरी पर प्राप्त हो जाती है जो हमारे लिए सौभाग्य की बात है। प्राचीन समय में कहां इतनी जद्दोजहद के बाद थोड़ी सी जानकारी उपलब्ध हो पाती थी ,परंतु आज हमारी मुट्ठी में ही दुनियां की सारी जानकारी उपलब्ध है। यह विज्ञान और सोशल मीडिया की देन है ।इसके द्वारा अपनी सभ्यता, संस्कृति ,परंपराएं और रीति-रिवाज, पौराणिक इतिहास एवं आध्यात्मिक बौद्धिक कथाओं का ज्ञान आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। हमारे प्रमाणिक ग्रंथों की सम्पूर्ण जानकारी Google पर प्रस्तुत है जिसे हम आसानी से ग्रहण कर सकते हैं। और साथ-साथ वर्तमान पीढ़ी को इसके बारे में बताते हुए भावी पीढ़ी के लिए भी सहेज कर रख सकते हैं।
हमारे नैतिक, सामाजिक मूल्य जिनकी आज सबसे अधिक आवश्यकता है सोशल मीडिया जैसे व्हाट्सएप और  फेसबुक के द्वारा हम उसका प्रचार - प्रसार कर सकते हैं।
हिंदी साहित्य में लेखन की विभिन्न विधाओं में आज नया लेखक मंच स्थापित हो चुका है एवं सोशल मीडिया पर ही अपनी रचनाओं को प्रकाशित कर रहा है । जिससे लोगों का रूझान पठन - पाठन की ओर बढ़ रहा है जो साहित्य की समृद्धि में सहायक है । यह मेरे मूल विचार है । प्रत्येक सिक्के के दो पहलू हैं। अपवाद  हर जगह मौजूद है। तो क्यों ना हम किसी भी चीज के सकारात्मक पक्ष  की बात ज्यादा करें ताकि हमारे विचार भी सकारात्मकता की ओर उन्मुख हो तथा हमारी भावनाएं विशुद्ध हो। क्योंकि हम जैसा देखते हैं, सोचते हैं, हमारे विचार भी वैसे ही बनने लग जाते हैं। इसलिए--

"सकारात्मक बनो, सकारात्मक सोचो

साहित्य को ,सोशल मीडिया में खोजो"।

मीडिया साहित्य का परिचालक--

वर्तमान संदर्भ में सोशल मीडिया साहित्य का सबसे बड़ा और सबसे सजग सुचालक बन गया है ।पौराणिक साहित्य को सहेज कर रखने के साथ-साथ बाल साहित्य के ऊपर कार्टून फिल्मों का निर्माण किया जा रहा है। सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ और महाकाव्य जैसे रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवत गीता, पंचतंत्र सभी पर निरंतर फिल्में, धारावाहिक इत्यादि प्रसारित होने से लोगों में न केवल साहित्य के प्रति रुचि जागृत हुई है, अपितु इसके साथ-साथ अपनी सभ्यता, संस्कृति और मूल्यों, परंपराओं आदि का ज्ञान भी उन्हें  सोशल मीडिया के माध्यम से आसानी से ही प्राप्त हो गया है। और इन सब का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है सामाजिक वातावरण में धार्मिकता का बोलबाला कायम हो पाया। बच्चों ने "जय श्री राम" कहना आरंभ कर दिया। जिससे कि समाज में अपनी भारतीय संस्कृति ,अपने मानवीय मूल्यों को बढ़ावा मिलने लगा।
सोशल मीडिया के द्वारा हमारे साहित्य को संभाल कर सहेज कर रखा गया है ।साहित्य की विभिन्न विधाओं का लोगों को ज्ञान हो रहा है क्योंकि प्रबुद्ध पाठक वर्ग तो लिखित साहित्य से ,अन्य स्रोतों से अपने विद्यालय, अपने विश्वविद्यालय से, अपनी जिज्ञासा शांत कर सकता है और प्रमाणित रूप से इन सबसे  संबंधित प्रचुर मात्रा में जानकारी हासिल कर सकता है ।परंतु सोशल मीडिया के द्वारा ऐसा दर्शक वर्ग भी लाभांवित होता है तो अक्षर ज्ञान से परिचित नहीं है । साहित्य को समझने का, पठन - पाठन करने का उनके पास कोई जरिया नहीं है ।वह भी सोशल मीडिया के माध्यम से प्रत्येक प्रकार की जानकारी प्राप्त कर सकता है। तथा परोक्ष रूप से ही  सही अपने भारत का, विश्व का ,विश्व की सभ्यता, संस्कृति, मूल्य आदर्शों की जानकारी हासिल कर सकता है।

सोशल मीडिया सामाजिक, नैतिक, धार्मिक मानवीय मूल्यो का संवाहक ---

सोशल मीडिया एक अदृश्य भूमिका निभाकर समाज में सामाजिक चेतना ,का नैतिकता का, एवं धार्मिक मूल्य तथा मानवीय चरित्र का परिवर्तन करता है। यह सब बातें अदृश्य प्रकृति की हैं। परंतु यह प्रभावशाली बहुत अधिक हैं। क्योंकि हमारी अन्तरात्मा ,आशीर्वाद ,भावनाएं, और सर्वशक्तिमान ईश्वर ये सब अदृश्य हैं,परंतु सत्य है,  ये सब हमारी सुरक्षा करते हैं ।मेरी इन बातों से शायद कई लोग सहमत ना हो। परंतु सत्य यही है कि जो लोग आस्तिक हैं, परमात्मा पर विश्वास करते हैं वह इस बात को अवश्य ही मानेंगे ।अपवाद हर जगह, हर चीज में पाए जाते हैं। इन सब उदार बातों को समझने के लिए ,आत्मसात करने के लिए, एक कोमल, स्वच्छ, निर्मल हृदय चाहिए जो ईश्वर हर किसी को प्रदान नहीं करते ।
इस प्रकार यह बातें सिर्फ बातें नहीं हैं। आध्यात्मिकता, नैतिकता, मानवीयता, सच्चरित्रता, इन सब की आवश्यकता आज समाज में ,राष्ट्र में ,विश्व में, सर्वोपरि है ताकि विश्व बंधुत्व, वैश्विक शांति की स्थापना के संप्रत्य को बल मिल सके। और आज विश्व का प्रत्येक राष्ट्र इसी लक्ष्य को प्राप्त करने की ओर अग्रसर है । धार्मिक साहित्य के द्वारा उसके प्रचार - प्रसार और  पठन - पाठन के द्वारा हम समाज में सोशल मीडिया के माध्यम से इन सब नैतिकता से भरपूर  मानवीय मूल्यों का प्रचार- प्रसार कर सकते हैं । इन सब भावनाओं के प्रसारण के लिए साहित्य और मीडिया दोनो ही एक उत्तम पर्याय सिद्ध हो सकते हैं।

यहां एक बात और कहना चाहूंगी कि आतंकवाद अगर फैल रहा है तो इसके पीछे भी एक कारण यह हो सकता है कि नौजवानों को उचित मार्गदर्शन, उचित शिक्षा, संस्कार, नैतिकता, धार्मिकता, सात्विकता, मानवीयता का पाठ यदि उचित समय पर पढ़ाया गया होता,यदि सोशल मीडिया के द्वारा ही सही मूल्यवर्धक साहित्य को  दिखाया गया, सुनाया गया होता, साहित्यिक की उचित जानकारी दी गई होती तो क्या यह आतंकवादी आज भी आतंकवादी ही होते?
तो यहां मेरा जवाब "नहीं"होगा ।क्योंकि बालक पर, किशोर अवस्था ,युवावस्था में भी उचित मार्गदर्शन प्रदान करने से हम अपने युवा पीढ़ी को पतन के रास्ते पर जाने से रोक सकते हैं। यथासंभव, यथाशक्ति प्रयास हम सबको अवश्य करने चाहिए ।

सोशल मीडिया पर साहित्य पर्यावरण के लिए अत्यंत लाभकारी ---

सोशल मीडिया पर पंचतंत्र हितोपदेश के द्वारा प्रकृति एवं जीव संरक्षण पर लघु फिल्म नाटिका, कार्टून फिल्म आदि के द्वारा छोटे बच्चों के मन में प्रकृति प्रेम ,  प्रकृति संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण, प्रत्येक प्रकार के प्रदूषणको रोकने के  उपाय जैसे कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर सूचना प्रदान की जा सकती है ।जिससे कि वह भविष्य में इन सब के प्रति जागरुक नागरिक बनकर व्यवहार कर सकें। इन सबके लिए साहित्य का आश्रय बहुत अधिक जरूरी है क्योंकि बिना साहित्य के सोशल मीडिया कुछ भी करने में सक्षम नहीं है।

सोशल मीडिया द्वारा  साहित्य में नव लेखक वर्ग एवं नव पाठक वर्ग का अवतरण---

वर्तमान मीडिया के द्वारा यह सब संभव हो पाया है कि नए लेखक वर्ग का उदय हुआ है। जो साहित्य की विभिन्न विधाओं में अपना सूजन कर रहे हैं। इसी के साथ - साथ पाठक वर्ग में भी उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है । यह सत्य है कि आज नए लेखक पर उभर कर सामने आ रहे हैं और अपनी रचनाओं का प्रकाशन मीडिया पर बिना किसी रोक सकते कर रहे हैं। परंतु इसका सबसे अधिक नुकसान यह हुआ है कि हिंदी का, हिंदी भाषा - विज्ञान का, हिंदी के छंद -अलंकारों का, हिंदी के साहित्य के गौरवशाली इतिहास का, उन्हें आवश्यक ज्ञान नहीं है  जिसके कारण उनकी रचनाओं में वह बात नजर नहीं आती है । हालांकि सभी लेखक  ऐसे नहीं हैं परंतु अधिकाधिक लेखक वर्ग इसी श्रेणी के अंतर्गत आता है ।
पहले रचनाएं संपादक के पास प्रकाशन हेतु भेजी जाती थी ।जिसमें समय तो लगता था परंतु यदि कोई रचना निरस्त कर दी जाती थी तो संपादक के द्वारा उसके कारण का भी उल्लेख होता था, जो भविष्य में अपनी भूल सुधार हेतु एक मार्गदर्शक का कार्य करता था। परंतु आज सोशल मीडिया में यह बात कहीं देखने को नहीं मिलती ।हर सिक्के के दो पहलू हैं अच्छाई और बुराई ।इसलिए हम दोनों पक्षों को  समालोचना के आधार पर स्वीकार करना होगा।

सोशल मीडिया एक साहित्य प्रचारक के रूप में ---

आज सोशल मीडिया एक साहित्य प्रचारक का कार्य कर रहा है। साहित्य का जितना प्रचार-प्रसार होगा, जितनी उपलब्धता होगी उसका उतना ही विस्तार होगा। और जब साहित्य का विस्तार होगा तो यह साहित्य जगत के लिए कल्याणकारी है। हर तकनीकी आविष्कार निरपेक्ष होता है जो हर तरह के काम के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। चाहे वह अच्छा हो या बुरा ।इसलिए  तकनीकी का आविष्कार किया गया। अविष्कार का सदुपयोग इसके दुरुपयोग के साथ ही जुड़ा है। हमें ज्यादा आश्चर्य नहीं करना चाहिए कि हर तकनिकी, वैज्ञानिक आविष्कार, व्यापक समाज के लिए रोचक या उपयोगी है तो वह आसानी से अपनी जगह बना लेता है। और जब नए - नए तकनीकी संवाद और संप्रेषण से जुड़ी बातें हो तो स्वाभाविक है कि अपने विशिष्टताओं के साथ संवाद और संप्रेषण के नए  पुराने तरीकों, उपकरणों और तकनीकों में से कुछ विस्थापित करके ही अपनी जगह बना लेती है।सोशल मीडिया का असर बस नकारात्मक ही नहीं है। ट्विटर जैसे मंचों की शब्दसीमा ने अपनी बात को चुस्त और कम से कम शब्दों में कहने के अभ्यास को संभव बनाया है। सोशल मीडिया ने सार्वजनिक अभिव्यक्ति और एक बड़े समुदाय तक निडर और बिना रोक-टोक और नियंत्रण के अपनी बात, अपनी सोच और अनुभव पहुंचाना संभव बनाकर करोड़ों लोगों को एक नई ताकत, छोटी बड़ी बहसों में भागीदारी का नया स्वाद और हिम्मत दी है। इस नई ताकत ने सरकारों और शासकों को ज्यादा पारदर्शी, संवादमुखी और जवाबदेह बनाया है, जनता के मन और नब्ज को जानने का नया माध्यम दिया है। सोशल मीडिया की ताकत ने सरकारों को अपने फैसलों, नीतियों और व्यवहारों को बदलने पर भी मजबूर किया है। पर क्या इस मीडिया ने लोक-विमर्श को ज्यादा गंभीर, गहरा, व्यापक, उदार बनाया है? क्या जब करोड़ों लोग एक साथ इतना लिख- बोल रहे हैं तो इन मंचों पर सार्वजनिक विमर्श की गुणवत्ता बढ़ी है, स्तर बेहतर हुआ है? इस पर दो टूक राय देना संभव नहीं, क्योंकि संसार में कुछ भी एकांगी, एकदिशात्मक नहीं होता।दरअसल भाषा के दो प्रमुख आयाम हैं। एक, उसका शुद्ध भाषिक आयाम जिसमें उसके शब्दों, वाक्य रचना, व्याकरण, शब्दकोश आदि पर ध्यान रहता है। दूसरा, भाषा का सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक संदर्भ जिसमें उसके इन संदर्भों में प्रयोग, परिवर्तनों, अर्थों, प्रभावों आदि पर ध्यान होता है। आज संसार की लगभग हर भाषा पर सोशल मीडिया के प्रभाव को महसूस किया जा रहा है, उसे समझने की कोशिश हो रही है और विमर्श हो रहा है। इस नए माध्यम ने हर नए माध्यम की तरह हर भाषा के प्रयोग के तौर-तरीकों, शब्दकोश, शैली, शुद्धता, व्याकरण और वाक्य रचना को प्रभावित किया है। यह असर लिखित ही नहीं, बोलने वाली भाषा पर भी दिख रहा है। जब ईमेल आया तो कहा गया कि पत्र लिखना ही समाप्त हो जाएगा। वह तो नहीं हुआ, लेकिन हाथ या टाइपराइटर से पत्र लिखने का चलन जरूर खत्म हो गया। पर बात यहीं तक नहीं है। अब एसएमएस, ट्विटर, फेसबुक और वाट्सएप ने बहुत से लोगों के लिए ईमेल को भी अनावश्यक और अप्रासंगिक बना दिया है। सोशल मीडिया ने अपनी एक नई भाषा गढ़ ली है। भाषा और शब्दों के सौंदर्य, मर्यादा, गरिमा और स्वरूप की चिंता करने वाले सभी इस नई भाषा के प्रभाव और भविष्य पर तो चितिंत हैं ही, इस पर भी हैं कि इस खिचड़ी, विकृत, कई बार अटपटी भाषा की खुराक पर पल-बढ़ रही किशोर और युवा पीढ़ी वयस्क होने पर किसी भी एक भाषा में सशक्त और प्रभावी संप्रेषण के योग्य बचेगी या नहीं। यह खतरा इसलिए भी गंभीर होता जा रहा है कि नई पीढिय़ां पाठ्य-पुस्तकों के अलावा कुछ भी गंभीर, स्वस्थ, विचारपूर्ण लेखन, साहित्य, वैचारिक पठन से लगातार दूर जा रही हैं। अच्छी, असरदार भाषा अच्छा पढऩे से ही आती है। अच्छी भाषा के बिना गहरा, गंभीर विचार, विमर्श, चिंतन और ज्ञान-निर्माण संभव नहीं। वे पीढिय़ां जो विद्यालयों की मजबूरन पढ़ाई के बाहर केवल या अधिकांशत: यह खिचड़ी और भ्रष्ट भाषा ही पढ़ लिख रही हैं उसकी बौद्धिक क्षमताएं ठीक से विकसित होंगी कि नहीं? अगर हमारे भावी नागरिक गंभीर चिंतन और विमर्श में सक्षम ही नहीं होंगे तो उसका उनके विकास के अवसरों और व्यापक सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, बौद्धिक, राजनीतिक विकास पर कैसा असर पड़ेगा, इस पर अभी हमारे बौद्धिक समाज, सरकार और नीति-निर्माताओं का ध्यान बहुत कम गया है।

निष्कर्ष ---
            निष्कर्षत: यही कहा जा सकता है कि सोशल मीडिया आज एक जरूरत बन चुका है। हर किसी के लिए क्योंकि हम साहित्यकार अपना सभी कार्य सोशल मीडिया के विभिन्न आयामों में करते हैं ,करते आ रहे हैं ,और करते रहेंगे, और करते रहना ही पड़ेगा क्योंकि यदि समाज मे साथ रहना है तो उसकी  गति के अनुसार ही चलना होगा। आज एक भी पल सोशल मीडिया के बिना गुजारा कर पाना संभव नहीं है ।और साहित्य के सृजन और प्रचार - प्रसार तथा संरक्षण के लिए जो भूमिका सोशल मीडिया निभा सकता है वह अन्य कोई नहीं। इसलिए साहित्य के संरक्षण के लिए सोशल मीडिया प्राण वायु के समान है।
                                               
लेखिका
डॉ विदुषी शर्मा ।
                           
              

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