त्रि युगी- भगवान विष्णु


आज एकादशी के उपलक्ष्य में एक सुंदर वृतांत।

हुम सभी जानते हैं कि भगवान विष्णु को एकादशी तिथि कितनी प्रिय है। और श्री कृष्ण  विष्णु जी के ही अवतार हैं। एक सुंदर कथा ......

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे

भगवान विष्णु को त्रि - युग कहते हैं।

वे तीन युगों -- सत्य, त्रेता तथा द्वापर में प्रकट होते हैं,  किन्तु कलियुग में नहीं होते,  लेकिन प्रह्लाद महाराज की स्तुतियों से समझ में आता है कि वे भक्त  के वेश में कलियुग में प्रकट होते हैं।
भगवान् चैतन्य ही वे भक्त हैं। किन्तु उन्होंने कभी इस भेद को प्रकट नहीं किया कि कृष्ण भक्त के रूप में प्रकट हुए हैं,  फिर भी रूप गोस्वामी ने उन्हें पहचान लिया,  क्योंकि भगवान् स्वयं को शुद्ध भक्त से छिपा नहीं पाते।
जब रूप गोस्वामी ने पहली बार भगवान् चैतन्य को नमस्कार किया तभी उनको पहचान गये थे।
वे जान गये कि भगवान् चैतन्य स्वयं श्री कृष्ण है,  अतः उन्होंने इन शब्दों में उनको प्रणाम किया,

*" मैं श्री कृष्ण की प्रार्थना करता हूँ जो अब भगवान् चैतन्य के रूप में प्रकट हुए हैं। "*
प्रह्लाद महाराज की स्तुतियों से भी इसकी पुष्टि होती है,  वे कलियुग में प्रत्यक्ष रूप में नहीं वरन् भक्त के रूप में प्रकट होते हैं। और हम सब बद्ध जीवों के उद्धार हेतू हरे कृष्ण महामंत्र का उपहार देते हैं।

*हरे कृष्ण हरे कृष्ण*    
             *कृष्ण कृष्ण हरे हरे*
*हरे राम हरे राम*
            *राम राम हरे हरे*

1 --इस मंत्र को किसी भी स्थिति, परिस्थिति में जपा जा सकता है।

2-- सोते जागते कोई कार्य करते हुए इसे जप सकते हैं।

3-- इसे माला पर जप सकते हैं।

4-- ग्रुप में कीर्तन के रूप में कर सकते हैं।

5-- स्वयं अकेले भाव विभोर हो कर गा  सकते हैं।

6--इस महामंत्र पर सूतक नहीं लगता अर्थात घर में किसी का जन्म हुआ हो तब भी जप कर सकते हैं। या घर में किसी की मृत्यु हुई हो तब भी कर सकते हैं।

7-- लड़कियां / महिलाएं अपनी अशुद्ध अवस्था में भी हरे कृष्ण महामंत्र जप सकती हैं।

8-- इस महामंत्र द्वारा भगवान् से सीधा सम्बन्ध कोई भी साध सकता है।( बच्चा, बूढ़ा, जवान,  स्त्री, पुरूष,  किसी जाति, धर्म या कुल का हो)

*।। हरे कृष्ण ।।*

भगवान विष्णु को त्रि - युग कहते हैं।

वे तीन युगों -- सत्य, त्रेता तथा द्वापर में प्रकट होते हैं,  किन्तु कलियुग में नहीं होते,  लेकिन प्रह्लाद महाराज की स्तुतियों से समझ में आता है कि वे भक्त  के वेश में कलियुग में प्रकट होते हैं।
भगवान् चैतन्य ही वे भक्त हैं। किन्तु उन्होंने कभी इस भेद को प्रकट नहीं किया कि कृष्ण भक्त के रूप में प्रकट हुए हैं,  फिर भी रूप गोस्वामी ने उन्हें पहचान लिया,  क्योंकि भगवान् स्वयं को शुद्ध भक्त से छिपा नहीं पाते।
जब रूप गोस्वामी ने पहली बार भगवान् चैतन्य को नमस्कार किया तभी उनको पहचान गये थे।
वे जान गये कि भगवान् चैतन्य स्वयं श्री कृष्ण है,  अतः उन्होंने इन शब्दों में उनको प्रणाम किया,

*" मैं श्री कृष्ण की प्रार्थना करता हूँ जो अब भगवान् चैतन्य के रूप में प्रकट हुए हैं। "*
प्रह्लाद महाराज की स्तुतियों से भी इसकी पुष्टि होती है,  वे कलियुग में प्रत्यक्ष रूप में नहीं वरन् भक्त के रूप में प्रकट होते हैं। और हम सब बद्ध जीवों के उद्धार हेतू हरे कृष्ण महामंत्र का उपहार देते हैं।

*हरे कृष्ण हरे कृष्ण*    
             *कृष्ण कृष्ण हरे हरे*
*हरे राम हरे राम*
            *राम राम हरे हरे।

एक बार फिर ,प्रेम से ....

जय प्रभुपाद

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
हरे कृष्ण दंडवत प्रणाम हरे कृष्ण
हरे कृष्ण दंडवत प्रणाम हरे कृष्ण।

संकलन एवम विश्लेषण कर्ता
डॉ विदुषी शर्मा

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