मीरा की भक्ति में दांपत्य का अलौकिक स्वरूप

मीरा की भक्ति में दांपत्य का अलौकिक स्वरूप

  शोधसार

मीराबाई अपने आप में एक संपूर्ण ग्रंथ है जो समग्रता लिए हुए है प्रेम की, करुणा की, समर्पण की, वैराग्य की, भक्ति की, चेतना की, दर्शन की, एकांत की, त्याग की, आत्म सम्मान की, समाजोत्थान की, आत्मोत्थान की, आत्म परंपरा की, निर्लिप्तता की, विश्वास की, तेजस्विता की, निरंतरता की, स्थितप्रज्ञता की, समता की और अनंत की। इससे अधिक और क्या कहा जा सकता है?
मीरा बाई का चरित्र ऐसा है कि जिसके जीवन के हर मोड़ पर, जीवन के हर पहलू पर शोध की अनेकानेक संभावनाएं प्रस्तुत है। उनका संपूर्ण चरित्र ऐसा है जो इतने वैविध्य से परिपूर्ण है, इतनी विशेषताओं से पूर्ण है कि यह समकालीन ना होकर, तत्कालिक ना होकर सर्वकालिक है Timeless है।यानि  इनकी चारित्रिक विशेषताएं उस काल में भी उतनी ही प्रासंगिक थी जितनी आज के युग में कही जा सकती हैं ।बल्कि यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि आज के युग में मीराबाई को सब समझना, समझाना अधिक महत्वपूर्ण है ।संगोष्ठी के सभी उपविषय एक दूसरे से संबंधित हैं और अन्योन्याश्रित भी।यह मीराबाई के चरित्र के विभिन्न बिंदु कहे जा सकते हैं जिनका कि जिक्र किए बिना किसी एक विषय पर शोध पूर्ण हो ही नहीं सकता। इसलिए हम भी प्रस्तुत विषय पर अपना शोध (प्रयास )प्रस्तुत करते हैं क्योंकि पूर्णता केवल ईश्वर में व्याप्त है। हम तो केवल पूर्णता को प्राप्त करने की ओर निरंतर अग्रसर हैं और कलयुग में इतना ही काफी भी है।
मीराबाई के चरित्र को कुछ  पन्नों पर उतार पाना संभव नहीं है क्योंकि वह दिव्यात्मा थी जो पूर्व जन्म के  प्रेम को लेकर उत्पन्न हुई। इस जन्म में भी केवल प्रेममयी जीवन जिया तथा अंत मे एक दिव्य ज्योति बनकर अपने आराध्य देव में ही समा गई ।उनकी देह भी इस लोक पर  दिखाई नहीं दी । वे एक ज्योति स्वरूप बनकर देखते ही देखते भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति के साथ ही एकाकार हो गई। ऐसी दिव्य विभूति, पवित्र आत्मा के बारे में लिखना अपने आप में एक कठिन कृत्य है फिर भी हम प्रयास करेंगे।

परिचय---

    मीरा बाई के प्रारंभिक जीवन में  ही  "आलौकिक दांम्पत्य जीवन" की नींव ।

मीराबाई का जन्म एक संपन्न परिवार में 1573 ईस्वी में चौकड़ी नामक गांव में हुआ था। बचपन से ही शांत स्वभाव की  मीरा ने एक दिन एक बारात को देख रही थी कि  अपनी  मां से पूछने  लगी कि---     "माँ   ये बारात क्या होती है? ये जो घोड़ी पर बैठा है वो कौन है?ये कहां जा रहे हैं?दुल्हन कौन होती है?विवाह क्या होता है"?आदि आदि। तब उनकी माँ ने उन्हें समझाया  कि सभी का विवाह होता है, एक दिन तुम्हारा भी होगा ,तुम्हारा भी दूल्हा आएगा, मेरा भी विवाह हुआ था, ऐसे सभी का होता है।इतने पर नन्ही  मीरा  हठ कर बैठी कि माँ मेरा तो अभी विवाह करो। " हट पगली ; ऐसे थोड़ी न होता है विवाह।उसके लिए  उची समय और दूल्हा भी तो जरूरी है "।

"तो मां मेरा दूल्हा कहां है, ला दो न मेरा दूल्हा, मुझे नहीं पता ,मुझे अभी चाहिए मेरा दूल्हा"। मीरा ने कहा ।
इतना कहकर वह बहुत समझाने पर भी नहीं मानी तो मां ने समझाया कि---  "बेटा दूल्हा समय आने पर ही आता है ,उसी के साथ कन्या का विवाह होता है  फिर उसके बाद  सारी उम्र उसी के साथ रहना होता है ,उसी की बन के रहना होता है, सभी नाते रिश्ते पीछे छूट जाते हैं, एक यही  रिश्ता, पति पत्नी का रिश्ता ही रह जाता है, यही धर्म बन जाता है, सभी स्त्रियों को यही धर्म निभाना पड़ता है, इसी 'तथाकथित' दूल्हे के साथ ही जन्म - मरण का  रिश्ता निभाना पड़ता है, यानी पति की मृत्यु के बाद 'सती' होना पड़ता है"। (ज्ञातव्य है कि जब भारत में सती प्रथा  का चलन था।)

तुलसीदास जी ने भी कहा है----

"सादर सास पति पद पूजा
नारी धर्म कछु और न दूजा।"

इन उदाहरणों को देकर मां ने तत्कालिक स्त्री के जीवन की मर्यादाएं  बताई, उसकी व्यवस्थाएं, उसकी विडम्बनाएं,उसकी पराधीनताएं, उसकी विवशताएँ इत्यादि  सभी का उल्लेख  संक्षिप्त रूप में कर दिया ।फिर इस पर भी छोटी बालिका मीराबाई  के बार - बार हठ ( बाल हठ के बारे में हम सब जानते हैं)     "मेरा दूल्हा अभी ला कर दो, मुझे अभी देखना है,मुझे अभी चाहिए अपना दूल्हा" तो माँ ने श्री कृष्ण जी की मूर्ति को उसके हाथ में थमा कर कहा    "यह रहा  तुम्हारा दूल्हा। बस; अब ठीक है"।
माँ ने सोचा कि बच्ची है बहल जाएगी, अभी कुछ ही समय में भूल जाएगी। परंतु मीरा बाई के कोमल हृदय पर तो  यही छाप पड़ गई कि

"अब यही मेरा दूल्हा है, यही मेरा सर्वस्व है, मुझे इसी के साथ जीना है, इसी के साथ मरना है ।मां के कहे अनुसार  मन,  वचन कर्म से मुझे इसी के साथ जीवन यापन करना है और मन मस्तिष्क में कभी भी  किसी और पर पुरूष का  ख्याल भी आने नही देना है"।  

मीराबाई की मां ने परोक्ष रूप में  स्त्रीजाति की स्थितियों का वर्णन किया कि हमारे समाज में नारी का अपना स्वतंत्र कोई अस्तित्व है ही नहीं ।वह सदैव पराधीन  ही रहती हैं । पहले अपने माता-पिता के और फिर अपने पति के  आधीन।उसकी  स्वतंत्रता (वैचारिक, मानसिक, शारीरिक )उसकी इच्छाएं, उसकी विशेषताएं,उसकी प्रतिभाएं आदि कोई मायने नहीं रखती । पति कैसा भी हो उसे सारी जिंदगी उसी के साथ जीवन यापन करना ही होगा ।इसके अतिरिक्त उसके पास कोई विकल्प है ही नहीं, और यदि पति की मृत्यु पहले हो जाती है तो "सती" होना ही होगा यानी ना तो जीते जी और ना ही जीवन के बाद उसकी इच्छा का कोई महत्व है। यह स्थिति सभी नारियों की थी चाहे वह उच्च कुल की हों, मध्य कुल की या फिर  नीच कुल की।(बल्कि     उनकी स्थिति तो और भी बदतर थी) यानी मीराबाई की मां ने परोक्ष रूप से ही सही अपने माध्यम से नारी जाति की स्थिति का, नारी जीवन की यथार्थता का चित्रण किया है।

तो इसी घटना से हुआ मीराबाई के दाम्पत्य जीवन का शुभारंभ।

दांपत्य के आधारों का मीराबाई द्वारा पूर्णता निर्वहन--

हमारे सत्य सनातन धर्म में "विवाह" एक नैतिक कर्तव्य है तथा गृहस्थ आश्रम एक अनिवार्य कर्म।इसी के साथ यह पितृ ऋण से मुक्त होने का एकमात्र उपाय भी माना गया है। अर्धनारीश्वर इस बात का प्रमाण है कि दांपत्य जीवन कितना आवश्यक है। ऋग्वेद के विवाह सूक्त  10/85 अथर्ववेद में 14/1, 7/37 तथा 7/38 सूक्त में पाणिग्रहण  संस्कार, मनुस्मृति इत्यादि कई महत्वपूर्ण ग्रंथों में दांपत्य जीवन का विस्तार से वर्णन मिलता है ।श्री राम जी और सीता जी तथा श्री विष्णु भगवान और लक्ष्मी जी आदर्श दंपत्ति माने गए हैं क्योंकि इन्होंने दांपत्य जीवन के आधारभूत 7 सोपानों का पूर्ण निर्वाह किया था।  विवाह के लिए आवश्यक 7 फेरों की तरह ही इन 7 सोपानों को ही वर्तमान में भी  दांपत्य जीवन का आधार माना गया है।
अनादि काल से ही सफल दांपत्य का आधार यह 7 सूत्र माने जाते रहे हैं। यह हैं -

1  संयम ।
2  संतुष्टि ।
3  संतान।
4  संवेदनशीलता ।
5  संकल्प ।
6  सक्षमता (शारीरिक और मानसिक)।
7  समर्पण ।

इनके अलावा दांपत्य जीवन का कोई आधार है ही नहीं और मीराबाई ने इन सभी आधारों का पूर्ण जीवन, बड़ी तन्मयता से निर्वाह किया। वे  इस क्षेत्र में अपवाद भी कही जा सकती हैं कि उनका पति साकार रूप में  न होकर निर्गुण, निराकार, सर्वशक्तिमान, परब्रह्म है जो कि वास्तविकता है। परंतु  वे इसे सगुण-साकार मानती हैं तथा पूर्ण प्रेम के रंग में रंगी हैं। अब हम इन सभी सात दाम्पत्य आधारों का  मीराबाई के चरित्र के साथ क्रमशः समायोजन करते हुए पृथक - पृथक  वर्णन करते हैं।

1 संयम

संयम दाम्पत्य जीवन का प्रथम सोपान या चरण है। अपनी भावनाओं का, अपनी इच्छाओं का, अपनी सम्वेदनाओं का  संयम।यहां पर मीराबाई पूर्णता संयमित रहते हुए भी अपने आप में ही विचरण करती है। यानी वे संयमित तो हैं , अनुशासित भी है, परंतु वह किसी भी प्रकार का बंधन स्वीकार नहीं करती। वह स्वच्छंद घूमती हैं, भजन गाती हैं, साधु संतों के साथ रहती हैं, यानी संयमित होकर भी अपनी इच्छाओं का, अपनी भक्ति का, अपने  प्रेम का दमन नही करती । परंतु यह भी सत्य है कि वे इसका प्रदर्शन भी नही करना चाहती बल्कि ये तो स्वयं ही  प्रदर्शित हो जाता है क्योंकि वह इस लोक दिखावे से बहुत ऊपर उठ चुकी थी। इसी भक्ति के चलते वह वृंदावन तथा द्वारिका भी गई। इसी दौरान उन्होंने तुलसीदास जी को एक पत्र भी लिखा जो इस प्रकार था --

 
"स्वस्ति श्री तुलसी कुलभूषण दूषन- हरन गोसाई।
बारहिं बार प्रनाम करहूँ अब हरहूँ सोक- समुदाई।।
घर के स्वजन हमारे जेते सबन्ह उपाधि बढ़ाई।
साधु- सग अरु भजन करत माहिं देत कलेस महाई।।
मेरे माता- पिता के समहौ, हरिभक्तन्ह सुखदाई।
हमको कहा उचित करिबो है, सो लिखिए समझाई"।।

मीराबाई के पत्र का जबाव तुलसी दास ने इस प्रकार दिया:-

"जाके प्रिय न राम बैदेही।
सो नर तजिए कोटि बैरी सम जद्यपि परम सनेहा।।
नाते सबै राम के मनियत सुह्मद सुसंख्य जहाँ लौ।
अंजन कहा आँखि जो फूटे, बहुतक कहो कहां लौ"।।

मीराबाई के संपूर्ण चरित्र में ही अलौकिकता दर्शनीय है।इस प्रकार वे इस प्रथम सोपान के निर्वाह पर खरी उतरती हैं।

2 संतुष्टि

हम सांसारिक लोग केवल दैहिक,शारीरिक  संतुष्टि को ही महत्व देते हैं ।परंतु  मीरा बाई अपने दाम्पत्य जीवन में अपवाद स्वरुप ही कही जा सकती हैं क्योंकि उनका विवाह  तो उदयपुर के महाराणा कुमार भोजराज जी से हुआ था ।परंतु उन्होंने  उसे पति माना ही नहीं और जब लोगों ने कहा कि तेरा पति  ही तेरा परमेश्वर है तो मीराबाई ने कहा कि  "हां आपने सही कहा कि परमेश्वर ही मेरा पति है "।
उदयपुर के महाराणा से उनका विधिवत विवाह हुआ था ।परंतु उन्होंने गृहस्थ जीवन को कभी अपनाया ही नहीं। उनका मानना था कि संसार में श्री कृष्ण के अलावा कोई अन्य पुरुष है ही नहीं ।

"मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई,
जाके सिर मोर मुकुट ,मेरो पति सोई" ।

सगुण भक्ति धारा की कवयित्री होने के नाते वे कृष्ण भक्ति में इतनी तल्लीन रहती थी कि उन्हें इसी में ही हर प्रकार की संतुष्टि मिल जाती थी। वे  इस संसार की, इस शरीर की संतुष्टि से ऊपर उठ चुकी थी ।
इस प्रकार आलौकिक दाम्पत्य का दूसरा आधार भी सिद्ध हो जाता है।

3 संतान

दांपत्य तथा सृष्टि का नियम है संतान प्राप्ति, संतानोत्पत्ति ।परंतु पूर्व में भी हमने कहा क्योंकि मीरा का गृहस्थ ,दांपत्य जीवन केवल कल्पना, स्वप्न तथा अलौकिकता पर आधारित था ,इसलिए संतानोत्पत्ति संभव ही नहीं थी। लेकिन उन्होंने उत्पन्न किया निष्काम प्रेम ,अटूट भक्ति ,निर्लिप्तता , निर्विकार स्वरूप, कृष्ण से एकाकार होने का एकमात्र उपाय, केवल अटूट भक्ति और पूर्ण समर्पण ।दीवानगी की हद तक प्रेम का एक सजीव उदाहरण-

"बसो मेरे नैनन में नंदलाल।
मोहनी मूरति, साँवरि, सुरति नैना बने विसाल।।
अधर सुधारस मुरली बाजति, उर बैजंती माल।
क्षुद्र घंटिका कटि- तट सोभित, नूपुर शब्द रसाल।
मीरा प्रभु संतन सुखदाई, भक्त बछल गोपाल"।।

इस प्रकार मीरा बाई ने संतान को उत्पन्न न करके उस ईश्वर की सभी "संतानो" के लिए मुक्ति और मोक्ष का प्रामाणिक रास्ता बताया ।
इस प्रकार दिव्य दाम्पत्य का तीसरा सोपान भी मीरा बाई द्वारा पार कर लिया जाता  है।

4 संवेदनशीलता

मीराबाई के चरित्र में जो कोई भी विशेषता है वह उच्च कोटि की है और अपने आप में एक मिसाल है।उनमें इतनी अधिक संवेदनशीलता है कि अपनी सुध-बुध खो कर  भी दीवानों की तरह अपने आराध्य देव, अपने प्रियतम, अपने पतिदेव को चाहना और यह जानते हुए कि वह साकार रूप में इस जीवन में कभी नहीं मिल पाएंगे तो भी श्री कृष्ण के प्रति उनकी संवेदनशीलता में एक क्षण भी कोई कमी नहीं आती है। वह साधु संतों से भी मिलती हैं परंतु उनका मन केवल श्री कृष्ण जी के चरणों में ही रमा है। वह साधु संगति को, भजन कीर्तन को, अपने आराध्य तक पहुंचने का सुगम और सरल मार्ग समझती हैं /बताती हैं। उनकी संवेदनशीलता का चरम  यह है कि वह यह मानती हैं कि श्री कृष्ण के अलावा कोई अन्य पुरुष इस धरती पर है ही नहीं और वही मेरे पति हैं, यानि मनसा ,वाचा ,कर्मणा के आधार पर  पूर्ण एकाधिकार। इस प्रकार  मीरा बाई द्वारा आलौकिक दाम्पत्य  चौथा सोपान भी सफलता पूर्वक पार कर लिया गया है।

5 संकल्प

दांपत्य जीवन का  पाँचवा आधार है 'संकल्प' यानि अपने जीवन साथी के साथ  पूर्ण जीवन का निर्वाह करने का संकल्प। परिस्थितियां चाहे अनुकूल हों या प्रतिकूल। यह संकल्प अडिग  रहना चाहिए चाहे वो स्त्री हो या पुरूष। मीराबाई पर  भी कितनी ही मुसीबत आईं, उन्हें जहर दिया गया, इतनी शान और शौकत भरी जिंदगी से दूर कर दिया गया, घर से निकाल दिया गया, कांटों के बिस्तर पर सुलाया गया, किं बहुना  कितने ही शारीरिक और मानसिक कष्ट पहुंचाए गए तब भी मीराबाई ने अपना संकल्प दृढ़ रखा कि मैं तो  केवल "हरिप्रिया" ही बन कर रहूंगी । स्वयं मीराबाई के ही शब्दों में--

"मीरा मगन भई हरि के गुण गाय।

सांप पिटारा राणा भेज्यो,मीरा हाथ दियो जाय।।

न्हाय धोय जब देखण लागी ,सालिगराम गई पाय।

जहर का प्याला राणा भेज्या ,अमृत दीन्ह बनाय।।

न्हाय धोय जब पीवण लागी हो गई अमर अंचाय"।

उनके पति की मृत्यु के बाद सभी ने उन्हें वैधव्य धारण करने के लिए कहा और "सती" होने के लिए प्रेरित किया  तो उन्होंने जवाब दिया कि-

"मेरे पति को कभी मृत्यु प्राप्त हो ही नहीं सकती । वो तो अजर और अमर हैं। इसलिए मैं आजीवन सदा सुहागन ही रहूंगी तथा अपना हार श्रृंगार ऐसे ही कायम रखूंगी" ।

यह  है आस्था का अटूट बंधन, अटूट संकल्प जो हमें परोक्ष रूप से प्रभु भक्ति की  शक्ति, विश्वास की पराकाष्ठा की ओर अग्रसर करता है। मीरा ने अपने जीवन का आदर्श स्वयं जीकर लोगों को बताया न कि केवल उपदेश के द्वारा ।उनका यही गुण उन्हें दूसरों से भिन्न करता है।
इस प्रकार दैविक दांपत्य का पांचवां सोपान भी मीरा बाई द्वारा बड़ी दिव्यता से पर कर लिया जाता है।

6  सक्षमता

हम लौकिक जीव ,सांसारिक लोग 'सक्षमता' के पर्याय के रूप में केवल शरीर को ही प्रथमिकता देते हैं। हम लोग  युवावस्था में विवाह के बंधन को मान्यता प्रदान करते हैं,और इसी नियम का  निर्वाह भी  करते हैं, क्योंकि सांसारिक धर्म में प्रवृत्त होने के लिए, संतानोत्पत्ति के लिए,गृहस्थ धर्म निभाने के लिए,अपने परिवार के  उचित पालन - पोषण के लिए,  शारीरिक व मानसिक शक्ति दोनो ही  अनिवार्य है। युवावस्था में यह दोनों अपने आप चरम पर होती है।( हलाकि  मानसिक शक्ति, समय और अनुभव के साथ-साथ अधिक परिपक्व, गंभीर एवं प्रबल होती जाती है, परंतु दांपत्य निर्वाह हेतु मानसिक क्षमता की जितनी पर्याप्त आवश्यकता होती है,वह युवावस्था में ही प्राप्त हो जाती है।)

मीरा बाई के पति साकार रूप में नही है (जिनको वे  अपना पति मानती हैं अर्थात श्रीकृष्ण जी) ।अतः वे इस सांसारिक धर्म में प्रवृत्त हुई ही नहीं।उनका प्रेम, उनकी भक्ति, उनका समर्पण, उनका कैवल्य, इस देह से कहीं अधिक है।वो आत्मिक बंधन में बंधी हुई हैं तथा अपने शरीर से केवल नित्यकर्म का ही कार्य करवाती हैं। वह एक दिव्यात्मा थी जो संसार को एक दिशा, एक उदाहरण प्रदान करने के लिए आई थी कि देखो    प्रेम और प्रेम विवाह ऐसे भी होते हैं जिसमें आकर्षण भी है, बंधन भी  परंतु शरीर है ही नहीं ,यानी आत्मा और परमात्मा का एकाकार हो जाना। वह एक ज्योति ही थी जो अनंत ज्योति में ही समा गई और संसार को एक मिसाल देकर चली गई।
इस तरह मीरा बाई दिव्य दांपत्य के छठे सोपान को भी सफलता पूर्वक प्राप्त कर लेती हैं।

7 समर्पण

दांपत्य  जीवन का अंतिम आधार है समर्पण।  पूर्ण समर्पण का पर्याय ही यदि मीराबाई को माना जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इससे अधिक समर्पण कहां होगा ? लोकलाज की परवाह किए,  संसारिक बंधनो को स्वीकार किए बिना, इस संसार में रहते हुए भी उस अदृश्य "दिव्यता" का सहारा लेकर, केवल और केवल उसी की होकर  पूर्ण समर्पित जीवन दिया और अंत में अपने आराध्य, अपने पति में ही समर्पित हो गई, उन्ही में ही समां गई । इस से अधिक समर्पण भाव कहां देखने को मिल सकता है जिसमें शारीरिक संतुष्टि का भाव ही उत्पन्न नहीं है। वे  केवल प्रेम तथा भक्ति में ही संतुष्ट हैं ,प्रसन्न है । मीराबाई ने किसी अन्य का साथ पूरी जिंदगी लिया ही नहीं। केवल श्री कृष्ण का ही साथ लिया , उसी के हाथ पूरा जीवन सौंप दिया । यह हम सभी सांसारिक जीवों के लिए यानी गृहस्थी लोगों तथा भक्तों के लिए एक संदेश है कि जब प्रेम, भक्ति और समर्पण करो तो ऐसा करो कि किसी अन्य की आवश्यकता ही ना हो। एक बार उस प्रभु को अपना बना लो तो जीवन भर उसे ना छोड़ो। वास्तव में यह सभी बातें सत्य होते हुए भी, स्वीकार्य होते हुए भी हम सबको  सांसारिक बंधनों को आदर करना ही पड़ता है, नियमों का पालन , मर्यादाओं का पालन ना चाहते हुए भी करना ही पड़ता है। परंतु मीराबाई इन सबसे अलग एक मिसाल हैं और उनका जीवन सभी के लिए चाहे वह भक्त हों , संसारिक जीव हों, सभी के लिए अनुकरणीय है,अभिनन्दनीय है।

इस प्रकार हम देखा की किस तरह से मीरा बाई की भक्ति में दाम्पत्य का आलौकिक स्वरूप दिखाई देता है ।केवल आवश्यकता है तो उस दिव्यता को देख सकने की ,महसूस कर सकने की और उसका आनंद लेने की तथा इसी के साथ - साथ उससे अभिप्रेरित होने की  और यदि संभव हो तो उसका अनुकरण करने की।

निष्कर्ष

वास्तव में देखा जाए तो मीराबाई का संपूर्ण जीवन, उनका चरित्र, उनकी भक्ति, उनका काव्य (जो की कवयित्री ना होते हुए भी उन्होंने रचा जिसमें प्रमुख हैं- बरसी का मायरा,  गीत गोविंद टीका ,राग गोविंद , राग सोरठ के पद
जो सगुण भक्ति धारा के स्तंभ माने जा सकते हैं एवं भक्तिकाल के कवियों में प्रमुख स्थान पाती हैं मीराबाई )उनका दर्शन ,उनका चिंतन उनका वैराग्य, उनकी विरह, उनका प्रेम, उनका आकर्षण ,उनका दांपत्य, उनका समर्पण ,और सबसे महत्वपूर्ण उनका  अनन्त में ही अंत यानि उसी में ही   सशरीर समा जाना । यह सभी कुछ उच्च कोटि का है।
हमने यहां केवल एक उपविषय पर उनके जीवन का एक पक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। परंतु  यदि सभी उपविषयों (28)को लेकर भी लिखा जाए तो उनका चरित्र उन सभी में भी नहीं समा पाएगा ।ऐसा ही अद्वितीय है मीराबाई का जीवन दर्शन, उनकी भक्ति में दांपत्य का आलौकिक  स्वरूप ।

लेखिका 
डॉ विदुषी शर्मा

ग्रंथानुक्रमणिका

1  विवाह की संसिद्धि।

2  मीराबाई का कृष्ण काव्य माधुर्य- मुंशी देवी प्रसाद।

3  संत मीराबाई और उनकी पदावली- बलदेव वंशी ।

4 भक्तिमतीन मीराबाई जीवन और काव्य- लाल बहादुर ।

5 नवभारत टाइम्स (स्पीइकिंग ट्री) ।

6 संत प्रवचन (अवधेशानंद गिरी) ।

7 ओशोधारा ।

8 कल्याण (गीताप्रेस गोरखपुर)।
 
9 मीरा के पद।
 
10  इंटरनेट साइट ।

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