पतंजलि योग शास्त्र : उद्भव ,विकास और वर्तमान संदर्भ में इसकी उपयोगिता।

पतंजलि योग शास्त्र : उद्भव ,विकास और वर्तमान संदर्भ में   इसकी उपयोगिता।

शोध सार

योग यानि 'जोड़ना' । स्वयं को विभिन्न कर्म करते हुए सात्विक प्रवृतियों के साथ मन, वचन, और कर्म के द्वारा ईश्वरीय तत्व को प्राप्त करने का प्रयास करना और अंत में मोक्षत्व की प्रेरणा से ईश्वर के साथ ही एकाकार हो जाना।
वर्तमान समय में योग को केवल शरीर को स्वस्थ रखने के लिए एक प्रक्रिया के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसमें केवल आसन या प्राणायाम ही शामिल है। परंतु योग वास्तव में तन और मन की,आत्मा की प्रक्रिया है और यह अपने आप में बहुत  गहरा अर्थ लिए हुए है ।वर्तमान समय में योग की क्या उपयोगिता होनी चाहिए एवं योग के द्वारा हम विभिन्न प्रकार की समस्याओं का हल किस प्रकार कर सकते हैं इस बारे में हमने इस शोध पत्र में अपने विचार प्रस्तुत किए हैं।

"योग क्या है" और "योग क्या कर सकता है।

परिचय ---

योग आर्य जाति की प्राचीनतम विधा है जिसमें  निर्विवाद रुप से यह स्वीकार कर लिया गया है कि मोक्ष का यदि कोई सर्वोत्तम उपाय है तो वह है "योग" ।
इस भवसागर से पार उतरने का एकमात्र उपाय,
इस संसार से "वि-योग" करके ईश्वर के साथ एकाकार हो जाने के लिए आवश्यक है उसके साथ जीवात्मा का "योग",  जीव और आत्मा का, परमात्मा के साथ 'योग'।
योग (+) यानि मिलन और जब हम मिलन की बात करते हैं तो "मिलन" सदैव श्रेयस्कर होता है।( यहां पदार्थों की बात नहीं है  जिनमें  कुछ विशिष्ट पदार्थों का मिलन विध्वंसकारी भी हो सकता है, यहां बात भावनाओं की हो रही है)

क्योंकि दुराव ,अलग होना ,दूरियां बढ़ाता है और एकाकार होने के लिए, एक दूसरे को समझने के लिए आवश्यक है "योग"।

योग यानी स्वयं का "बढ़ना" या "बढ़ाना"( जब  कहीं भी योग (+)होगा तो चाहे वस्तु हो या व्यक्तित्व, उसमें वृद्धि अवश्यंभावी है)  ।

अपनी चित्तवृत्तियों से कलुषित विचारों को त्याग कर, शुद्ध आचरण (मनसा-वाचा-कर्मणा) करके, अपने अस्तित्व को इहलोक से मोक्षत्व की ओर बढ़ाना ही "योग" है ।ईश्वर से मिलाने में योग ही भक्ति और ज्ञान का प्रधान साधन है। चित्र वृत्तियों का निरोध ही योग है ।

"योग" की व्यापकता ----

"योगाश्चितवृत्ति निरोध :"।
यद्यपि उपलब्ध योग सूत्रों के रचयिता महर्षि पतंजलि माने जाते हैं परंतु योग पतंजलि से भी प्राचीन आध्यात्मिक प्रक्रिया है। विभिन्न सहिंताओं, ब्राह्मणों, उपनिषदों स्मृतियों, में इसका विवेचन उपलब्ध है। योग अत्यंत व्यापक विषय है। वेद ,उपनिषद,  पुराण रामायण, महाभारत ,आयुर्वेद, अलंकार आदि कोई भी ऐसा शास्त्र नहीं है जिसमें "योग" का उल्लेख ना मिलता  हो।

"योग" शब्द की उत्पत्ति---

योग संस्कृत की मूल धातु "युज" से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है जोड़ना, संलग्न करना अथवा मिलाना यानि इस लोक की आत्माओं  का परमात्मा से मिलन, उस परम शक्ति ईश्वर से एकाकार होने की प्रक्रिया ही "योग" है ।

"योग" शब्द का स्त्रोत----

योग का इतिहास उतना ही पुराना है जितना कि सनातन धर्म में सृष्टि पर वेदों की उत्पत्ति का है ।श्रीमदभगवत गीता में श्रीकृष्ण ने स्पष्टतया यह कहा है कि उन्होंने स्वयं योग का रहस्य सबसे पहले आदि देव सूर्य भगवान को सुनाया था ।फिर सूर्य देव ने यह विद्या मनु (आदि पुरुष) को दी थी ।तत्पश्चात यह हस्तांतरित होते हुए इक्ष्वाकु  वंश के राजाओं तक पहुंची, जिन्होंने इसका हर प्रकार से संरक्षण किया। इसका प्रमाण  निम्न श्लोक है ,

इम विवस्ते  योगं प्रोक्तावानहमव्ययम।
विवस्वान मनवे प्राहमनुरक्क्षितवाक्वेब्रवीत।।

(श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4-श्लोक 1)

अर्थात हे अर्जुन योग के इस रहस्य को सर्वप्रथम मैंने सूर्य को कहा, सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु से कहा।
इस प्रकार योग के प्रथम रचियता तो स्वयं श्री कृष्ण भगवान ही है।

"हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता : नान्य: पुरातन:"

  हिरण्यगर्भ (श्री विष्णु या श्री कृष्ण) से पौराणिक इस ग्रंथ का कोई और रचयिता  नहीं है अर्थात हिरण्यगर्भ ही इस योग के जन्मदाता है ।

योग का संप्रत्यय----

योग वास्तव में अपने आप में अनूठा है जो केवल शरीर से संबंधित तत्व नहीं है। योग का अर्थ  'जोड़ना' है। 'जोड़ना' यानी अधिकाधिक गतिविधियों में खुद को 'जोड़ना' या  संलग्न करना और अधिकाधिक कर्मों में, अधिकाधिक वैशिष्ट्य में, शून्य में ,बुद्ध तत्व में, ज्ञान में, वैराग्य में, चिंतन में ,ब्रम्ह आदि में स्वयं को जोड़ना ।योग का अर्थ इतना सरल नहीं है। पूरा जीवन भी लग सकता है इसे समझने में, जानने में ,आचरण करने में ,सर्वोच्च सत्ता के बारे में जानने में और उसी के साथ एकाकार हो जाने में ,(समाधि) यानि "पूर्णत्व" को प्राप्त कर लेना योग है ।

वर्तमान परिस्थितियां एवं योग की सक्रिय सकारात्मक भूमिका --

आज भारत की जो परिस्थितियां हैं वह चाहे सामाजिक हो, नैतिक हो ,आर्थिक हो, या राजनैतिक हो, वह किसी से भी छुपी नहीं है। यह सच है कि हम दिनों-दिन प्रगति के पथ पर अग्रसर हो रहे हैं ।भारत विश्व में एक शक्ति बनकर उभर रहा है। परंतु इसी के साथ- साथ हमारी  भारतीय पहचान ,हमारी संस्कृति, हमारे मूल्य, हमारी धरोहर, हमारे रीति-रिवाज, मान्यताएं, परंपराएं आदि वह सब कहीं पीछे छूटती जा रही हैं ।आज हम मंगल ग्रह तक पहुंच गए हैं परंतु अपनी जड़ों को ही भूलते जा रहे हैं। जैसे किसी कवि ने सत्य ही कहा है कि

"आज दिवस में तिमिर बहुत है जैसे हो सावन की भोर,

मानव तो आकाश की ओर, मानवता पाताल की ओर" ।

इस प्रकार की भावनाओं को, समस्याओं को योग के द्वारा कैसे हल किया आ जा सकता है, इस पर अब हम बात करते हैं।

1 योग के द्वारा  सामाजिक, नैतिक, धार्मिक परिवर्तन संभव---

मानव एक सामाजिक प्राणी है और समाज शुरू होता है, परिवार से।परिवार में आवश्यक है - प्रेम ,समर्पण,अनुशासन,त्याग ,संगठन ,सम्मान, रीति- रिवाज, मान्यताएं, धार्मिकता , नैतिकता, मानवीय मूल्य आदि। यह सब बातें हमारे भारतवर्ष के लगभग हर परिवार की पहचान हुआ करती थी, चाहे वह परिवार किसी भी जाति संप्रदाय से संबंधित रहा हो। संयुक्त परिवारों का चलन था ।यह सब  बाते बच्चे अनजाने  में अपने आप ही सीख जाते थे। विभिन्न संस्कारों का प्रत्यारोपण बाल्यावस्था में ही हो जाता था। सामाजिक वातावरण भी अच्छा हुआ करता था ,जिसमें आपसी भाईचारा ,नैतिकता सभी पर्याप्त मात्रा में देखे जा सकते थे ।
परंतु आज का वातावरण कैसा होता जा रहा है, यह किसी से भी छुपा नहीं है। हम योग  के द्वारा इसे कैसे ठीक कर सकते हैं तो यह सब हम बताने का प्रयास करते हैं।

कोई भी कार्य आरंभ होता है 'मन' से, एक विचार से।और उसे  आरंभ करने के लिए, यथार्थ रूप से करने के लिए हमें शरीर की आवश्यकता होती है ।तो योग में आहार और प्रत्याहार ,यम, नियम के द्वारा न केवल हम अपने तन, मन को शुद्ध और स्वस्थ कर सकते हैं अपितु मनसा, वाचा ,कर्मणा के द्वारा सकारात्मक सामाजिक, धार्मिक चेतना एवं परिवर्तन ला सकते हैं। आज की युवा पीढ़ी योग के साथ इन नियमों का पालन करेगी तो उनका मन शुद्ध होगा तथा एक स्वस्थ तन में ही एक स्वस्थ मन का निवास होता है। स्वस्थ मन यानी जिसमें विचार सकारात्मक हो। हम अपने आने वाली पीढ़ी को एक शुद्ध, शांत, स्वच्छ सामाजिक, नैतिक वातावरण प्रदान कर सकते हैं ,केवल 'योग' अपनाकर और जब  सामाजिक और नैतिक चेतना तथा जागरुकता आ जाएगी तो उसी के साथ धार्मिकता का भी प्रवेश हो जाएगा। और धर्म चाहे कोई भी हो शांति, उन्नति ,सच्चाई ,सन्मार्ग, परहित  इत्यादि ही सिखाता है ।और योग में भी तो यही है।यदि हम सबमें          
  "शुद्ध मन, स्वस्थ तन, एवं सात्विक आत्मा"             

होगी तो आप स्वयं ही कल्पना कर सकते हैं कि आने वाला समय कैसा होगा। आज समाज में व्याप्त बुराइयां नशाखोरी, व्याभिचार, पश्चिमीकरण अब धीरे- धीरे समाप्त हो जाएगा क्योंकि योग के द्वारा स्वयं ब्रम्हचर्य ,भारतीयता इत्यादि का निर्वाह किया जाता है ।इस प्रकार हम देखते हैं कि किसी भी बड़े परिवर्तन को करने के लिए सबसे पहली इकाई में परिवर्तन अपरिहार्य है।अतः किसी भी राज्य में, देश में परिवर्तन( किसी भी प्रकार का) तभी संभव है जब 'हम' में परिवर्तन होगा, यानी समाज की  प्रत्येक इकाई में ,प्रत्येक मानव में परिवर्तन होगा ।तभी राष्ट्रीय स्तर पर परिवर्तन की बात  सोची जा सकती है । यह सब योग के द्वारा संभव है, क्योंकि योग  आज अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर चुका है ।प्रत्येक वर्ष 21 जून  "अंतरराष्ट्रीय योग दिवस" के रुप में मनाया जाता है।

2 योग के द्वारा पर्यावरण संरक्षण संभव--

पर्यावरण की सुरक्षा वर्तमान में एक  विश्वस्तरीय समस्या बन चुकी है। योग द्वारा प्रकृति संरक्षण, प्रकृति के साथ समायोजन संभव है। सबसे पहले तो शाकाहार द्वारा ही कितना प्राकृतिक संतुलन हो जाएगा ।जब सभी लोग योग के बारे में जानेंगे तो उन्हें शुद्धता, शुचिता और स्वच्छ वातावरण के बारे में जानकारी होगी और उन्हें इसकी महत्ता के बारे में तभी पता चल जाएगा।फिर धीरे-धीरे लोग प्रकृति की तरफ मुड़ना प्रारंभ कर देंगे। क्योंकि आहार-विहार ,प्रत्याहार ,नियम आदि यह सब प्रकृति का सानिध्य प्रदान करते हैं। और शांति पाठ के द्वारा तो वनस्पति जगत औषधियों के बारे में भी वर्णन है।
सारतत्व में यही कहना चाहती हूं कि जैसे- जैसे हम लोग को अपने दैनिक जीवन में योग को आत्मसात करना आरंभ कर देते हैं। वैसे ही हम स्वयं के, प्रकृति के, समाज के, धर्म के, सहजता के, सरलता के, त्याग के, समर्पण के, कृतज्ञता के, आत्मा के, ईश्वरत्व के और अधिक समीप आते जाते हैं ,और इन्हें अपने जीवन का हिस्सा बनाने लगते हैं ।यह सब बातें केवल "शब्द" नहीं है ।क्योंकि 'सहज' और 'सरल' होना ही पर्याप्त है और इन दोनो संप्रत्यो को साधने में  पूरा जीवन भी निकल जाता है। इन दो "शब्दों" को अपने आचार, व्यवहार, आचरण में लाने के लिए।

3 योग के द्वारा समाज के कमजोर वर्ग के लोगों को आलंबन --

योग न केवल शारीरिक बल प्रदान करता है अपितु आत्मिक बल, आध्यात्मिक बल भी प्रदान करता है । हमारे समाज में कितने ही ऐसे उदाहरण है जो शरीर से अक्षम होते हुए भी आत्म बल के आधार पर वह सब कर गए जो बड़े-बड़े बलिष्ठ व्यक्ति भी नहीं कर पाए। इन सब के पीछे योग की ताकत थी जो उन्हें हर प्रकार का आश्रय और बल प्रदान कर रही थी, अभिप्रेरणा प्रदान कर रही थी। वे न तो स्वयं से हारे,न  ही   परिस्थितियों से और ना ही किसी भी प्रकार की मुसीबत से ।इसमें दीपा मलिक पैरालंपिक मेडल विजेता, अरुणिमा सिन्हा दिव्यांग एवरेस्ट विजेता, इन सब के हौसले  एवरेस्ट  से भी ऊँचे है  और इन्होंने  अपनी इच्छा शक्ति  और योग के द्वारा  विश्व में  भारत का नाम रोशन किया। स्वयं पर दृढ़ विश्वास  के द्वारा इन्होंने इस प्रकार असंभव को भी संभव कर दिया। (ऐसे और भी कई उदाहरण हैं उन सबका नाम लेना संभव नहीं है)

योग सर्वकालिक है एवं चारों वर्णों तथा चारों आश्रमों में  सदैव हितकारी है --

योग अपने आप में अद्वितीय है। हिंदू धर्म में प्रचलित चारों वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य शूद्र  और चारों आश्रम ब्रम्हचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास। इन चारों आश्रमों में पृथक - पृथक योग अत्यंत महत्वपूर्ण है। चारों वर्णों की बात करें तो योग प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक एवं लाभकारी है ।जहां तक चारों आश्रमों की बात है तो हम इसके बारे में थोड़ा विस्तार से बताते हैं।

१ ब्रह्मचर्य आश्रम --

यह आश्रम 25 वर्ष तक होता है जिसमें ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना होता है एवं आजीविका को प्राप्त करना होता है ।यानी इस जीवनकाल में बचपन, विद्यार्थी जीवन प्रमुख है। शिक्षा ग्रहण प्रमुख है और इन सब में आवश्यकता है तन और मन के शुद्ध ,बलिष्ठ एवं सात्विक रहने की। तभी हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर पाएंगे और इन सब को प्राप्त करने में योग से अधिक महत्वपूर्ण कुछ नहीं हो सकता।

२ गृहस्थ आश्रम --

गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करते ही जिम्मेदारियां अनुशासन, प्रेम, समर्पण, बंधन, नियम, संस्कार व्यायाम, शारीरिक संबंध ,संतानोत्पत्ति आदि इन सब का समावेश हो जाता है तो मन को संयमित एवं तन को हृष्ट-पुष्ट रखने के लिए योग से उत्तम साधन हो ही नहीं सकता ।

३ वानप्रस्थ आश्रम --

पुरातन काल में जब व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाता था तो वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करता था ।परंतु आजकल यह परंपरा नहीं है फिर भी जब इस कलयुग में भी हम अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन सफलतापूर्वक कर लेते हैं तो अपने आप में एक संतुष्टि प्राप्त होती है तथा उस जीवन काल में जब लगभग हमारे सभी काम पूर्ण हो चुके हैं एवं हमारी किसी को ज्यादा आवश्यकता नहीं होती तो अपने आप को स्वस्थ रखने के लिए ,व्यस्त रखने के लिए योग से बढ़िया साधन कैसे हो सकता है। इसीलिए यहां भी योग अत्यंत लाभकारी है।

४ सन्यास आश्रम--

सन्यास आश्रम तो पूर्णतया ही योग पर ही आधारित है ।इसमें आहार, नियम,ध्यान आदि सभी का समग्र रूप से सम्मिलन है ।कुंडलिनी जागृत, सभी चक्रों का ज्ञान, इडा ,पिंगला, सुषुम्ना आदि नाड़ियों का अनुशासन, मोक्षत्व की प्राप्ति का उद्देश्य ,आत्मा ,परमात्मा के रहस्यों का ज्ञान, और अंत में ईश्वरत्व में ही एकाकार हो जाना। परंतु यह अवस्थाएं बहुत कम लोगों को प्राप्त हो पाती है। परंतु फिर भी    निरंतर प्रयास करते रहना  ही हमारा कर्म होना चाहिए। इन सब में योग हमारी बहुत अधिक सहायता करता है।

  "बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय"  योग द्वारा संभव--

    इतिहास गवाह है  कि हमारे ऋषि मुनियों ने,  हमारे महापुरुषों ने सबसे अधिक ध्यान सार्वजनिक कल्याण पर  दिया । हमारे पौराणिक ऋषि मुनि इन सब कार्यों को बहुत रुचि के साथ  करते थे ।
दधीचि ऋषि ने अपने जीवन का बलिदान लोक कल्याण हेतु समाधि लेकर किया था।उन्होंने अपने अस्थियो को दान दे दिया था ।इन सभी का एक ही लक्ष्य था  कि अधिक से अधिक जनकल्याण हो सके । आज भी लोग अपना कर हम इस संकल्पना को मूर्त रूप दे सकते हैं

निष्कर्ष --

निष्कर्षत: यही कहा जा सकता है कि यदि भारत को पुनः जगद्गुरु बनाना है, उसे अपने मूल्य, अपनी संस्कृति, अपने संस्कार ,सत्य सनातन धर्म, अपनी परंपराएं ,आदि यदि सुरक्षित, संरक्षित रखना चाहते हैं तो इन सब के लिए सर्वोत्तम साधन 'योग' है क्योंकि यह अकेला ही ऐसा है विषय है जो समग्रता लिए  है। इसमें धर्म, कर्म, ज्ञान, भक्ति, वैराग्य, मोक्ष तो है ही और परोक्ष रूप में इसमें उपलब्ध है धार्मिकता, नैतिकता, सामाजिकता, पर्यावरण संरक्षण ,प्रकृति प्रेम, संगठन, सहजता, सरलता ,विश्वास, प्रेम ,त्याग, करुणा और सबसे बड़ा जो गुण है वह है अपनी मातृभूमि के ऋण को चुकाने का, अपनी मातृभूमि के प्रति कर्तव्य को निभाने का ।
योग मन - शरीर - आत्मा तीनों के लिए आवश्यक तत्व है । दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक, आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करने का आधार है। वैश्विक शांति का द्योतक योग ही हो सकता है। योग के द्वारा संभव हो सकता है
'सोच बदलो - देश बदलेगा'  विचार बदलेगा,  परिस्थितियां बदलेगी तो युवा पीढ़ी बदलेगी , पश्चिमीकरण का अंधानुकरण समाप्त होगा । स्वराज ,स्वदेश प्रेम, स्वदेशी उत्थान की बात सामने होगी। इसलिए योग के द्वारा ही यह सब संभव है ।इन सब भावनाओं का समग्र द्योतक है योग ,यह हम सिद्ध कर चुके हैं ।

"अतः पूरे मनोयोग से क्यों ना अपनाएं सनातन योग,
मन शुद्ध हो ,आत्मा विशुद्ध हो, और तन रहे सदा निरोग"।

                      इतिश्री।
                      शुभमस्तु।

संदर्भ ग्रंथ

1व्यासदेव  -- योगभाष्यम।
2 वाचस्पति मिश्र -- तत्ववैशारदी।
3 राघवानंद सरस्वती -- पातंजल रहस्यम। 4विज्ञानभिक्षु -- योगवार्तिकम ।
5 नारायण तीर्थ -- योगसिद्धांतचंद्रिका ।
6 भोजदेव -- राज मार्तंड ।
7 नारायण तीर्थ  -- सुत्रार्थबोधिनी।
8 सत्यदेव -- योगरहस्य ।
9 बलदेव मिश्र -- योग प्रदीपिका।
10 सदा शिवेन्द्र सरस्वती --  योग सुधाकर।
11 नागोजी भट्ट -- योगसूत्र वृत्ति।
12 सत्यदेव -- योगरहस्यम।

लेखिका
डॉ विदुषी शर्मा

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