पहचान


                       पहचान

"बेटा अपने बूढ़े बाप को यतीमख़ाने छोड़कर वापस जा रहा था तो कि उसकी बीवी ने फ़ोन किया और कहा "अपने बाप को ये भी कह दो कि त्यौहार पर भी घर आने की ज़रूरत नहीं, अब वहीं रहें और हमें सुकून से जीने दें",
बेटा वापस मुड़ा और यतीमख़ाने गया तो देखा कि उसका बाप यतीमख़ाने के मैनेजर के साथ ख़ुश गप्पों में व्यस्त है और वो यूं बैठे थे जैसे बरसों से एक दूसरे को जानते हों।
बेटे ने पूछा "सर, आप मेरे पिता को किस त़रह़ और कब से जानते हैं?
उसने मुस्कराते हुए जवाब दिया, "जब ये यतीमख़ाने से एक बच्चे को गोद लेने आए थे"

ये एक  'पहचान' बताकर मैनेजर ने एक बेटे की असली पहचान करवा दी ,खुद से,और उस शख्स से जिसने कभी ज़ाहिर ही नही होने दिया कि वो उसकी ओलाद नही थी।
इसलिए समय रहते हम सबको सिर्फ ये करना है कि जिन माता- पिता ने हमें पहचान दी, उनसे ,उनकी पहचान कभी नही छीननी चाहिए कि वो किसी वृद्धाश्रम में केवल एक नम्बर बनकर रह जाएं।उनकी पहचान हमारे माता- पिता के तौर पर यूं ही बनी रहे,बस यही शुभकामनाएं करती हूँ।

संकलनकर्ता एवम विश्लेषण कर्ता
डॉ विदुषी शर्मा

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