भारतीयता

बोधकथा

भारतीय स्वाभिमान

रवि अपने दादा जी के साथ आज उनके शहर कुरुक्षेत्र आया है ।उसे अपने दादा जी के साथ रहना बहुत अच्छा लगता है, और लगे भी क्यों ना ?उसके दादू उसके अभिन्न मित्र हैं ,अंगरक्षक है, पथ प्रदर्शक हैं, उसके सुख- दुख के साथी हैं ,और उसके सभी मित्रों की ढेर सारी बातें सुनने के लिए एकमात्र व्यक्ति। तो इतनी सब चीजों को कोई कैसे छोड़ सकता है यानि All in One .
आज रवि अपने दादू के साथ कुरुक्षेत्र आया है, तो सारे रास्ते वह जो भी देखता है, उसी के बारे में सवाल पूछता रहता है ।उसके दादू भी रवि की मासूमियत और उसकी जिज्ञासा दोनों को ही पसंद करते हैं। उसके दादू बड़े प्रेम ,धैर्य और विस्तार से रवि की हर बात का जवाब देते हैं ।
अब रवि ने ब्रह्म सरोवर में स्नान किया और अब बारी थी उसके सवालों की झड़ी की, तो दादू तो इसके लिए पहले ही तैयार थे। कुछ तो उनकी शिक्षा ,अनुभव ने उन्हें सिखा दिया था और कुछ अब उन का पोता रवि उन्हें सिखाने  में लगा हुआ था, क्योंकि रवि जहां भी जाता है, वह उस के स्थान के नाम, उसकी पहचान, उस स्थान की विशेषता आदि से संबंधित पूरी प्रमाणिक जानकारी  जब तक प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक ना तो वह खुद चैन से बैठता है और ना ही अपनी दादू को बैठने देता है ।इसके चलते उसके दादू रवि को जहां भी घुमाने ले जाते हैं, उससे पहले उस स्थान की पूरी जानकारी लेना नहीं भूलते।
एक दिन वह अपने मित्र से कह रहे थे कि  "सुनो भाई ,मेरा पोता रवि तो अब इस उम्र में भी मुझे इतिहास और जो ज्योग्राफीया पढ़ाने से नहीं चूकता ।कमबख्त ऐसे-ऐसे सवाल पूछता है कि बस धोती बचाकर भागना पड़ता है हा - हा -हा ।पर उसकी इसी आदत ने हमें अपने भारतीय इतिहास, उसकी गौरवमई गाथा को जानने में मदद की है। और Learning is an Endless Process उक्ति को चरितार्थ कर दिया है। चलो ,हमारा भी मन लगा रहता है, ईश्वर उसे दीर्घायु दे"।
यह सब सुनकर बहुत अच्छा लगा था रवि को। अब जब ब्रह्म सरोवर में स्नान हो गया तो दादू  तैयार है रवि के सवाल रूपी मिसाइलों को झेलने के लिए। उन्होंने बताना आरंभ किया कि यह है वही कुरुक्षेत्र की पावन धरती है, जहां भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से पूरी दुनिया को सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ "गीता" का ज्ञान दिया था ।फिर उन्होंने भगवान विष्णु के 11 अवतारों की जानकारी दी, और बताया कि सत्य सनातन धर्म का महत्व क्या है, हमारा धर्म विश्व में सर्वप्रथम सर्वोपरि है। भारत जगतगुरु है, क्योंकि इसके पास जितना साहित्य है, जितनी धार्मिकता है, जितनी नैतिकता है, जितने मानवीय मूल्य हैं, सामाजिकता है, जितने सिद्धांत हैं ,जितनी मान्यताएं है कि हम नदी को माँ  और वृक्षों को भी देवता कहते हैं, उतनी किसी और दी देश में हो ही नहीं सकती।
हमारा धर्म हमें सभी धर्मों का सम्मान करना सिखाता है। हमारी प्रार्थना विश्व के सभी लोगों के लिए होती है जिसमें जाति-पाति ,संप्रदाय या किसी और सीमा रेखा(सरहद )बॉर्डर लाइन को स्वीकार नहीं किया जाता ।हमारा धर्म हमें 'सर्वे भवंतु सुखिना:" सिखाता है जिसमें हर जीव  के सुख की कामना की जाती है , ना कि सिर्फ मनुष्य जाति की।
हमारी परंपराएं "अतिथि देवो भव "की रही हैं। हम विश्व शांति ,विश्व बंधुता, वैश्विक भाईचारे की बात करते हैं ।हम ना केवल पृथ्वी अपितु अंतरिक्ष, वनस्पति (पर्यावरण )तक की शांति की बात करते हैं जैसे   "ओम शांति अंतरिक्ष शांति पृथ्वी-------"।
यानी हमारा भारत ना केवल धार्मिकता की दृष्टि से श्रेष्ठ है, अपितु वह व्यावहारिक धरातल पर भी वैमनस्य, हिंसा और मानवीय विकृतियों काम, क्रोध, लोभ आदि को त्यागने की बात करते हुए पूरे विश्व में शांति, प्रेम, भाईचारा, करुणा आदि की स्थापना का द्योतक है ,और वह इस पथ पर अग्रसर भी है। अभी हाल ही में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जी ने जो यू-एन में अपना भाषण दिया उस भाषण में भी  इन्हीं मूल्यों के बारे में स्पष्टता से बताया गया था। धन्य है भारत भूमि, धन्य हुए हम इस पावन धरा पर जन्म लेकर ।आई एम प्राउड टू बी एन इंडियन।I am proud to be an Indian. दादू के इन भाव भरे वाक्य को रवि टकटकी लगाए सुनता रहा और इन सब को उसने अपने छोटे से दिमाग में समेट कर रख लिया और वो भी सदा - सदा के लिए। उसने अपने भारत की मिट्टी को माथे पर लगाया। यह देखकर रवि के दादू की आंखों में आंसू आ गए ।उन्होंने रवि को अपने सीने से लगा लिया और बहुत देर तक अपनी छाती में ठंडक का आनंद लेते रहे, जो संतान की संतान से प्राप्त होती है। यह शीतलता चंदन से भी बढ़कर है, स्वर्गिक आनंद से भी अधिक है। इसका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता।
वास्तव में हमारी नई पीढ़ी का कोई कसूर नहीं है। यदि हम उचित समय पर उनके मन- मस्तिष्क में संस्कार रुपी बीज रोपित करेंगे तो समय आने पर उस में अंकुरण अवश्य प्रस्फुटित होंगे। यह शाश्वत प्रक्रिया है ।
इसलिए हमें अपने संस्कार ,मूल्यों को सहेज कर रखने के साथ - साथ हम सबका  का यह पावन कर्तव्य है कि हम इन्हें सुरक्षा पूर्वक अपनी नई पीढ़ी को हस्तांतरित भी करें ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियां हमारे भारतवर्ष का गौरव, उसकी संस्कृति ,उसकी पहचान, उसकी मान्यताएं आदि सभी के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त कर सकें। हमारा भारत आरंभ से ही जगतगुरु रहा है, और आगे भी जगत गुरु बनने की राह पर अग्रसर है। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ ,जय भारत, जय हिंदुस्तान, जय हिंद ।
लेखिका
डॉ विदुषी शर्मा

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