संसद में हिन्दी ,कल आज और कल

राष्ट्रभाषा गौरव सम्मान एवं :

संसद में हिंदी - कल आज और कल।

हिंदी केवल एक भाषा ही नहीं है। हिंदी है प्रत्येक हिंदुस्तानी का गर्व , हिंदी है प्रत्येक हिंदुस्तानी की पहचान, हिंदी है हिंदुस्तान का ताज। हिंदी भाषा का इतना परिचय यद्यपि काफी है ,परंतु हिंदी के ज्ञान ,उसकी अभिव्यक्ति, उसका इतिहास, उसकी सरलता , उसकी सहजता, उसकी परिपक्वता, उसकी मिठास और गहराई और भी न जाने क्या - क्या जिन्हें शब्दों में वर्णित करना आसान कृत्य नहीं है। इन सब के बारे में हम विस्तार से जानने का प्रयत्न करेंगे क्योंकि "पूर्णता" किसी भी विषय पर प्राप्त करना अपने आप में एक लक्ष्य है । हम केवल अपने सार्थक प्रयास करेंगे।

हिंदी को भारत की राजभाषा के रूप में 14 सितंबर 1949 को स्वीकार किया गया था। इसके बाद संविधान के अनुच्छेद 343 से 351 तक राजभाषा के संबंध में व्यवस्था की गई है। संविधान के अनुच्छेद 120 के अनुसार यह स्पष्ट कर दिया गया है कि किन प्रयोजनों के लिए केवल हिंदी का प्रयोग किया जाना है, किन के लिए केवल हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं का प्रयोग आवश्यक है ,तथा किन कार्यों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाना है। यह राजभाषा अधिनियम 1963, राजभाषा अधिनियम 1976 और उनके अंतर्गत समय-समय पर राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय की ओर से जारी किए गए निर्देशों द्वारा निर्धारित किया गया है।
भारतीय संसद भारत की धुरी है, यह सम्पूर्ण राष्ट्र की 'रक्तधारा' है। हिंदी का अधिकाधिक प्रयोग  होता रहेगा तो काफी हद तक संभव है  कि हिंदी का प्रयोग करने वालों में, चाहे वह कोई भी हो आपसी भाईचारा, मानवीय मूल्य ,प्रेम, त्याग, समर्पण आदि भाव बने रहेंगे क्योंकि हिंदी हमारे मनोभावों को उजागर करने के लिए एक सशक्त माध्यम है। हमारे देश की उन्नति में परोक्ष रूप से हिन्दी का योगदान अविस्मरणीय रहा है क्योंकि यह पूर्ण भारत को आपस में तथा विश्व के साथ शांति, सद्भावना, मैत्री,विश्व बंधुत्व ,वैश्विक भाईचारा आदि सम्वेदनाओं को व्यक्त करने में तथा उन का निर्वहन करने में  हमारी सहायता करती है, और जब  नियम और कानून हिंदी में अभिव्यक्त होंगे एवं हमारे राजनेताओं के द्वारा हिंदी का अधिकाधिक प्रयोग किया जाएगा तो इससे जुड़ी हुई भावनाओं का प्रचार-प्रसार अवश्यंभावी है ।हिंदी का प्रभाव सर्वकालिक है।
हिंदी को राजभाषा का सम्मान कृपापूर्वक नहीं दिया गया है, बल्कि यह उसका अधिकार है। इस संबंध में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के द्वारा बताए गए  राष्ट्रभाषा के लक्षण ही पर्याप्त हैं, जिन पर हिंदी बिल्कुल खरी उतरती है ।

1  उस भाषा के द्वारा भारतवर्ष का आपसी, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवहार होना चाहिए।

2 यह जरूरी है कि भारत वर्ष में बहुत  लोग इस भाषा को बोलते हो।

3 राष्ट्रके लिए वह भाषा आसान होनी चाहिए।

4   उस भाषा का विस्तार करते समय किसी क्षणिक या अल्प स्थाई स्थिति पर जोर नहीं देना चाहिए ।

राजभाषा हिंदी का सफर जो  गुजराती के महान कवि नर्बद (1833-86) ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का विचार रखा था, तब से लेकर आज तक कई पड़ावों को पार करता हुआ यहां तक पहुंच गया है,  जब अप्रैल 2017 में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी द्वारा 'आधिकारिक भाषाओं पर संसद की समिति' की सिफारिश को स्वीकार कर लिया गया, जिसमें कहा गया है कि
" राष्ट्रपति और ऐसे सभी मंत्रियों और अधिकारियों को हिंदी में ही भाषण देना चाहिए और बयान जारी करनी चाहिए जो हिंदी पढ़ और बोल सकते हों "।

वास्तव में हिंदी में दिया हुआ भाषण, जो समय- समय पर हमारे राजनेताओं द्वारा दिया गया, न केवल भारत में,अपितु विदेशी धरती पर भी हमेशा से ही प्रभावशाली रहा है। फिर चाहे वह प्रधानमंत्री श्री मोदी जी के द्वारा दिए गए  विभिन्न भाषण हों  या विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जी द्वारा यूनाइटेड नेशन में दिया गया भाषण।
इस प्रकार संसद और हिंदी की गरिमा अनंत है।  ईश्वर से यही प्रार्थना है कि

जब तक सूरज चांद रहे,
'संसद' और 'हिंदी' काम करें,
दोनों भारत की शान रहें,
जग में दोनों का नाम रहे।

जय हिंद, जय भारत।

लेखिका
डॉ विदुषी शर्मा

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