सोशल मीडिया एक अदृश्य परिपक्व बंधन

सोशल मीडिया और एक अदृश्य  परिपक्व बंधन

आज मैं बात करती हूं सोशल मीडिया के सबसे सशक्त और वर्तमान साधन Facebook और WhatsApp की  ।आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जब सब अपने आप में मस्त है। रोजमर्रा की जिंदगी में अपने कार्य स्थान पर पहुंचने के रास्ते को आसान बनाने के लिए लोग सोशल मीडिया का अत्यधिक आश्रय ले रहे हैं। इसके बारे में लगभग सभी जानते हैं ।इससे होने वाले प्रत्यक्ष लाभ और हानियों के बारे में भी हम जान चुके हैं। हर सिक्के के दो पहलू की तरह  हम दूर से पास हुए हैं ,वही पास होकर भी दूर होते जा रहे हैं ।
मैं आज इसके एक दूसरे पहलू के बारे में अपने विचार प्रस्तुत करना चाहती हूँ। उम्र के इस दौर में जब हम  30  या 35 प्लस  या इससे भी अधिक  है।  जब हम  सब यहां अपने घर -गृहस्थी का बोझ  कर्तव्य परायणता के साथ निभा रहे हैं । उम्र के इस दौर में अनजाने लोगों में शुरुआती बातचीत के बाद कई लोगों से इतना आत्मीय  और एक अजीब सा अदृश्य  बंधन सा महसूस होने लगा है। हम सब उम्र के इस दौर में है जब शारीरिक आकर्षण हम पर हावी नहीं हो सकता। हम सब अपने घर परिवार में सुखी हैं एवं एक दूसरे की पूरी फिक्र करते हुए पूरे परिवार की कुशलता की मंगलकामनाएं भी करते हैं। हम एक दूसरे से प्यार करते हैं क्योंकि प्यार सिर्फ रिश्तो में ही नहीं होता ।हमारा प्यार  हर रिश्ते के लिए बराबर है । हर रिश्ता  प्रेम, समर्पण, आत्मीय  भावों   से भरा है । और  हम उस में कटौती भी नहीं करते ।
परन्तु  यह एक आत्मीयता एवं गुणों से भरपूर व्यक्तित्व के हृदय से इज्जत व सम्मान का प्यार है । बातचीत के आधार पर ही एक दूसरे के काफी हद तक पहचान हो जाती है क्योंकि जिस प्रकार अनाज की किस्म मुट्ठी भर नमूने को देख कर ही की जा सकती है ।उसी प्रकार थोड़ी बहुत बात करने से ही व्यक्ति की सोच, उसकी शिक्षा ,उसके संस्कार, उसके भावनाएं उसके समझने  का स्तर,उसकी मानसिकता एवं अपने प्रति उसके नजरिए का ज्ञान 90% तक सही किया जा सकता है ।इन सब  शुरुआती  बातों के बाद एक अदृश्य बंधन की शुरुआत होती है। जिसमें प्रातः वंदन से लेकर रात तक के कार्यकलापों का वर्णन तो होता ही है। साथ में किसी विशेष विषय पर भी बातचीत संभव हो जाती है। अपने पारिवारिक सदस्यों की जान पहचान के साथ - साथ यह दूरियां थोड़ी और कम हो जाती है जिससे थोड़ी राहत  मिलने लगती है ।बात ना होने पर एक अधूरापन सा लगता है। हम सभी जानते हैं कि  जीवन में हम सभी एक दूसरे से शायद ही कभी  मिल पाएं। फिर भी एक प्यारा सा बंधन कायम है । हम सब  परिपक्वता लिए हुए हैं एवं उम्र के इस दौर से गुजर रहे हैं जहां  दिखावे से अधिक अनुभव की आवश्यकता होती है।  बाहरी  सौन्दर्य से अधिक  आंतरिक सुंदरता का ज्यादा  महत्व होता है।
यहां तक आते-आते  एक दूसरे की फ़िक्र, उसकी भावनाएं, उसके जज्बात ,उसकी थकावट ,उसकी मजबूरी, भविष्य की चिंताएं वर्तमान की खुशी, आदि   इन सब बातों को एक दूसरे के साथ बांटते हैं। इन सब को सिर्फ "एक नाम" नहीं दिया जा सकता ।यहां मैं पुरानी फिल्म खामोशी का एक गाना बताना चाहूंगी जिसमें कहा गया है------
" सिर्फ एहसास है ये रूह से महसूस करो,
प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम ना दो"

इस प्रकार हम एक पवित्र आत्मीय बंधन से जुड़ते जा रहे हैं। अपवाद हर जगह मौजूद हैं। परंतु जिन लोगों से भी हमारे विचार ,हमारी शिक्षा का स्तर, हमारी भावनाएं, मानसिकता का स्तर , मिल  जाता है, उन्हें हम खोना नहीं चाहते ।यह जानते हुए भी कि शायद इस जीवन में हम कभी उनसे मिल पाएँ?तो भी इस अबूझ अनोखे रिश्ते को बनाए रखना चाहते हैं। एक अजीब सी खुशी मिलती है इस पवित्रता में। इस भावनाओं के रिश्ते में।
और यह सब उस ईश्वरीय सत्ता का प्रसाद है कि हम अपने उम्र के इस दौर में उन लोगों से जान पहचान बढ़ा पाए जो हमारी तरह हैं। हमसे प्यार करते हैं ,हमारा सम्मान करते हैं। कई लोग प्यार को गलत परिभाषित करते हैं ।मैं पूछती हूं क्या प्यार सिर्फ एक ही इंसान से किया जा सकता है ?क्या  स्त्री-पुरुष के बीच केवल एक ही रिश्ता हो सकता है? क्या पुरुष के विभिन्न रूपों में या स्त्री के विभिन्न रूपों में हम एक दूसरे  को प्यार नहीं करते?  क्या एक पुरुष अपनी मां, पत्नी, बहन और बेटी से प्यार नहीं  करता?  यही सब बातें स्त्री जाति के लिए भी आती है ।वह भी अपने संपर्क में आने वाले, रिश्तो  के अन्तर्गत आने वाले सभी पुरुषों से यानि  पिता, पति,भाई और बेटे के रुप में प्यार करती है ।तो फिर एक स्त्री-पुरुष में इन सबकेअलावा क्या एक रिश्ता  और  नहीं  समा सकता? जिसका जीवन में एक अलग स्थान निश्चित है, एक अलग भावना है,अलग तरह का प्रेम है ।जिस तरह से अलग भावना के लिए ,रिश्ते  के लिए  प्रेम है,वैसे ही उसकी अभिव्यक्ति है ।
इसी प्रकार तो फिर एक स्त्री और पुरुष के बीच क्या एक  और रिश्ता नहीं चलाया जा  सकता ?जिसमें केवल आत्मीयता हो ,प्यार हो, सम्मान हो, फिक्र हो, समझ हो ,गहराई हो। जिस में शारीरिक आकर्षण का लेशमात्र भी स्थान ना हो। हां यह संभव है ।उस भगवान की कृपा से। हमें कुछ ऐसे खूबसूरत रिश्ते को निभा रहे हैं जिसमें ना स्वार्थ है ना कुछ चाहत। बल्कि कई बार तो हम वह बातें भी एक दूसरे से बांटना चाहते हैं जो हम अपने घर में नहीं कह सकते। अपनी तकलीफ को नहीं कह सकते क्योंकि जो हमारे साथ हैं, हमसे प्यार करते हैं हम यह नहीं चाहते कि हमारी तकलीफ से उनको कोई तकलीफ हो ।इसलिए हम इन सब बातों को अनजाने रिश्तेदारों से साझा कर लेते हैं ।
इस तरह के रिश्ते में पाने की चाहत नहीं है ।है तो सिर्फ परिपक्वता, सम्मान। यह मेरा खुद का भी अनुभव है मुझे इस सोशल मीडिया ने बहुत से अच्छे इंसानों से मिलने का, समझने का मौका दिया है जिनका एक सुरक्षित और एक अलग स्थान है।
इन सबके साथ और भी बहुत कुछ है जिसे शब्दों में लिख पाना संभव कृत्य नहीं है।

लेखिका
डॉ विदुषी शर्मा

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