श्री रामचरितमानस में राम से आरंभ होने वाले चौपाईयां और दोहे तथा इनका महत्व


रामचरितमानस में "राम" से आरंभ होने वाली चौपाईयां और दोहे तथा इनका महत्व ।

मानस प्रेमी ही जान पायेगें कि तुलसीदास जी  ने कितना परिश्रम किया होगा, इस प्रस्तुति को संकलित करने में, हम कलयुगी जीव केवल इन्हें पढ़कर ही अपना जीवन सफल कर सकते हैं क्योंकि इन सब में "राम" है और जहाँ "राम" हैं वहां प्रेम है, भक्ति है, समर्पण है, विश्वास है, श्रद्धा है, त्याग है, मर्यादा है , करूणा है,और जब इतने सकारात्मक गुण  हमारे जीवन में एक साथ आ जाते हैं तो फिर वह जीवन वास्तव में ही सार्थक हो जाता है क्योंकि इन सब का किसी के भी जीवन में आना एक विशुद्ध चरित्र को जन्म देता है, यानी किसी भी मनुष्य के जीवन में यह सब गुण जब आ जाते हैं तो वह चरित्र  निश्चल, विनम्र, और विशुद्ध, आत्मीय तथा प्रभु के सामिप्य को प्राप्त करने वाला हो जाता है,  और कहते भी है ना

'राम से बड़ा राम का नाम' और

"कलयुग केवल नाम अधारा,
सिमर सिमर नर उतरहिं पारा।

और जहां "राम" हैं वहां सब कुछ है।
इसलिए यदि इन चौपाइयों के अर्थ हमें ना भी समझ में आए तो केवल पढ़ने भर से हमारे जीवन का उद्धार संभव है आवश्यकता है तो केवल विश्वास की, आस्था की, भक्ति की, प्रेम की और समर्पण की।

श्रीरामचरितमानस में श्रीरामनाम से प्रारंभ होने वाले दोहे और चौपाइयाँ!!!!!!
                   ।। श्री गणेशाय नमः ।।

           ।। राम श्रीराम श्रीराम श्रीराम ।।

राम भक्ति जँह सुरसरि धारा सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा ।।
राम भगति भूषित जियँ जानी। सुनिहहिं सुजन सराहि सुबानी ।।
राम चरित सर बिनु अन्हवाएँ । सो श्रम जाइ न कोटि उपाएँ ।।
राम सुकीरति  भनिति भदेसा । असमंजस अस मोहि अँदेसा ।।
राम चरन पंकज  मन जासू । लुबुध मधुप इव तजइ न पासू ।।

राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार ।
तुलसी भीतर बाहरेहुँ जौ चाहसि उजिआर ।।

राम भगत जग चारि प्रकारा। सुकृती चारिउ अनघ उदारा।
राम भगत हित नर तनु धारी । सहि संकट किए साधु सुखारी ।।
राम एक तापस तिय तारी । नाम कोटि खल कुमति सुधारी ।।
राम सुकंठ बिभीषन दोऊ । राखे सरन जान सबु कोऊ ।।
राम भालु कपि कटकु बटोरा । सेतु हेतु श्रमु कीन्ह न थोरा ।।
राम सकुल रन रावनु मारा । सीय सहित निज पुर पगु धारा ।।
राम नाम कलि अभिमत दाता । हित परलोक लोक पितु माता ।।

राम नाम नरकेसरी कनककसिपु कलिकाल ।
जापक जन प्रहलाद जिमि पालिह दलि सुरसाल ।।

राम सुस्वामि कुसेवक मोसो । निज दिसि देखि दयानिधि पोसो ।।

राम निकाई रावरी है सबही को नीक ।
जौ यह साँची है सदा तौ नीको तुलसीक ।।

रामकथा कलि पनंग भरनी । पुनि बिबेक पावक कहुँ अरनी ।।
रामकथा कलि कामद गाई । सुजन सजीवनि मूरि सुहाई ।।
रामहि प्रिय पावनि तुलसी सी । तुलसिदास हित हियँ हुलसी सी ।।

रामकथा मंदाकिनी चित्रकूट चित चारु ।
तुलसी सुभग सनेह बन सिय रघुबीर बिहारु ।।

रामचरित चिंतामनि चारू । संत सुमति तिय सुभग सिंगारू ।।
रामचरित राकेस कर सरिस सुखद सब काहु ।
सज्जन कुमुद चकोर चित हित बिसेषि बड़ लाहु ।।

रामकथा कै मिति जग नाहीं । असि प्रतीति तिन्ह के मन माहीं ।।

राम अनंत अनंत गुन अमित कथा विस्तार ।
सुनि आचरजु न मानिहहिं जिन्ह के बिमल बिचार ।।

राम धामदा पुरी सुहावनि । लोक समस्त बिदिति अति पावन ।।
रामचरितमानस एहि नामा । सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा ।।
रामचरितमानस मुनि भावन । बिरचेउ संभु सुहावन पावन ।।
राम सीय जस सलिल सुधासम । उपमा बीचि बिलास मनोरम ।।
रामभगति सुरसरितहि जाई । मिली सुकीरति सरजु सुहाई ।।
राम तिलक हित मंगल साजा । परब जोग जनु जुरे समाजा ।।
राम राज सुख विनय बड़ाई । बिसद सुखद सोइ  सरद सुहाई ।।
राम सुप्रेमहि पोषत पानी । हरत सकल कलि कलुष गलानी ।।
राम नाम कर अमित प्रभावा । संत पुरान उपनिषद गावा ।।
रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही । कहिअ बुझाइ कृपानिधि मोही ।।
रामभगत तुम्ह मन क्रम बानी । चतुराई तुम्हारि मैं जानी ।।
रामकथा ससि किरन समाना । संत चकोर करहिं जेहि पाना ।।
रामकथा मुनिबर्ज बखानी । सुनी महेस परम सुख मानी ।।

राम बचन मृदु गूढ़ सुनि उपजा अति संकोचु ।
सती सभीत महेस पहिं चलीं ह्रदयँ बड़ सोचु ।।

राम नाम सिव सुमिरन लागे । जानेउ सतीं जगतपति जागे।
राम चरित अति अमित मुनीसा । कहि न सकहिं सत कोटि अहीसा ।।
रामु सो अवध नृपति सुत सोई । की अज अगुन अलखगति कोई ।।

राम कृपा तें पारबति सपनेहुँ तव मन माहिं ।
सोक मोह संदेह भ्रम मम बिचार कछु नाहिं ।।

रामकथा सुरधेनु सम सेवत सब सुख दानि ।
सतसमाज सुरलोक सब को न सुनै अस जानि ।।

रामकथा सुंदर कर तारी । संसय बिहग उड़ावनिहारी ।।
रामकथा कलि बिटप कुठारी । सादर सुनु गिरिराजकुमारी।
राम नाम गुन चरित सुहाए । जनम करम अगनित श्रुति गाए ।।
राम सच्चिदानन्द दिनेसा । नहिं तँह मोह निसा लवलेसा ।।
राम ब्रह्म ब्यापक जग जाना । परमानंद परेस पुराना ।।
राम सो परमातमा भवानी । तँह  भ्रम अति अबिहित तव बानी ।।
राम ब्रह्म चिनमय अबिनासी । सर्ब रहित सब उर पुर बासी ।।
राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी । मत हमार अस सुनहि सयानी ।।
राम जनम के हेतु अनेका । परम बिचित्र एक ते एका ।।
राम कीन्ह चाहहिं सोइ होई । करै अन्यथा अस नहिं कोई।
रामचन्द्र के चरित सुहाए । कलप कोटि लगि जाहिं न गाए।

रामु लखनु दोउ बंधुबर रूप सील बल धाम ।
मख राखेउ सबु साखि जगु जिते असुर संग्राम ।।

राम अनुज मन की गति जानी । भगत बछलता हियँ हुलसानी ।।
राम देखावहिं अनुजहि रचना । कहि मृदु मधुर मनोहर बचना ।।
राम कहा सब कौसिक पाहीं । सरल सुभाव छुअत छल नाहीं ।।
रामहि चितव भाँय जेहि सीया । सो सनेहु सुखु नहिं कथनीया ।।
राम रूप अरु सिय छबि देखें।नर नारिन्ह परिहरीं निमेषें।।

रामहि प्रेम समेत लखि सखिन्ह समीप बोलाइ ।
सीता मातु सनेह बस बचन कहइ बिलखाइ ।।

राम चहहिं संकर धनु तोरा।होहु सजग सुनि आयसु  मोरा।
राम बाहुबल सिंधु अपारू।चहत पारु नहिं कोउ कड़हारू।

राम बिलोके लोग सब चित्र लिखे से देखि ।
चितई सीय कृपायतन जानी बिकल बिसेषि ।।

रामरूप राकेसु निहारी । बढ़त बीचि पुलकावलि भारी ।।
रामहि लखनु बिलोकत कैसें । ससिहि चकोर किसोरकु जैसें ।।
रामु सुभाँय चले गुरू पाहीं । सिय सनेहु बरनत मन माहीं।
रामु लखन दसरथ के ढोटा । दीन्हि असीस देखि भल जोटा ।।
रामहि चितइ रहे थकि लोचन । रूप अपार मार मद मोचन।

राम बचन सुनि कछुक जुड़ाने । कहि कछु लखन बहुरि मुसुकाने ।।
राम कहेउ रिस तजिअ मुनीसा । कर कुठारू आगें यह सीसा ।।
राम मात्र लघु नाम हमारा । परसु सहित बड़ नाम तोहारा।
राम कहा मुनि कहहु बिचारी । रिस अति बड़ि लघु चूक हमारी ।।
राम रमापति कर धनु लेहू । खैंचहु मिटै मोर संदेहू ।।
रामु लखनु उर कर बर चीठी । रहि गए कहत न खाटी मीठी ।।

राम लखन कै कीरति करनी । बारहिं बार भूपबर बरनी ।।
राम सरिस बरु दुलहिनि सीता । समधी दसरथु जनकु पुनीता ।।
रामहि देखि बरात जुड़ानी । प्रीति कि रीति न जाति  बखानी ।।


रामु सीय सोभा अवधि सुकृत अवधि दोउ राज ।
जँह तँह पुरजन कहहिं अस मिलि नर नारि समाज ।।

राम रूपु नख सिख सुभग बारहिं बार निहारि ।
पुलक गात लोचन सजल उमा समेत पुरारि ।।

रामहि चितव सुरेस सुजाना गौतम श्रापु परम हित माना।

रामचंद्र मुख चंद्र छबि लोचन चारु चकोर ।
करत पान सादर सकल प्रेमु प्रमोदु न थोर ।।

राम सीय सुंदर प्रतिछाहीं । जगमगात मनि खंभन माहीं ।।
राम सीय सिर सेंदुर देहीं।सोभा कहि न जाति बिधि कहीं।
राम बिदा मागत कर जोरी । कीन्ह प्रनामु बहोरि बहोरी ।।
राम करौं केहि भाँति प्रसंसा।मुनि महेस मन मानस हंसा ।।
रामहि निरखि ग्राम नर नारी।पाइ नयन फलु होहिं सुखारी।
राम दरस हित अति अनुरागीं । परिछनि साजु सजन सब लागीं ।।
रामहि देखि रजायसु पाई।निज निज भवन चले सिर नाई।

राम प्रतोषीं मातु सब कहि बिनीत बर वैन ।
सुमिरि संभु गुर बिप्र पद किए नीदबस नैन ।।

रामु सप्रेंम संग सब भाई । आयसु पाइ फिरे पहुँचाई ।।

राम रूपु भूपति भगति ब्याहु उछाहु अनंदु ।
जात सराहत मनहिं मन मुदित गाधिकुलचंदु ।।

राम रूपु गुन सील सुभाऊ । प्रमुदित होइ देखि सुनि राऊ।
राम सीय तन सगुन जनाए । फरकहिं मंगल अंग सुहाए ।।
रामहि बंधु सोच दिन राती । अंडन्हि कमठ हृदउ जेहि भाँती ।।

राम राज अभिषेकु सुनि हियँ हरषे नर नारि ।
लगे सुमंगल सजन सब बिधि अनुकूल बिचारि ।।

राम करहु सब संजम आजू । जौ बिधि कुसल निबाहै काजू ।।
रामहि छाड़ि कुसल केहि आजू । जेहि जनेसु देइ जुबराजू ।।
राम तिलकु जौं साँचेहुँ काली । देउँ मागु मन भावत आली ।।
रामहि तिलक कालि जौं भयऊ ।  तुम्ह कहुँ बिपति बीजु बिधि बयऊ ।।
रामहि देउँ कालि जुबराजू । सजहि सुलोचनि मंगल साजू ।।
राम सपथ सत कहँउ सुभाऊ । राममातु कछु कहेउ न काऊ ।।
रामु साधु तुम्ह साधु सयाने । राममातु भलि सब पहिचाने ।।
राम राम रट बिकल भूआलू । जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू ।।
राम सुमंत्रहि आवत देखा । आदरु कीन्ह पिता सम लेखा ।।

रामु कुभाँति सचिव संग जाहीं । देखि लोग जँह तँह बिलखाहीं ।।
राम सत्य सबु जो कछु कहहू ।  तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू ।। 
रामहि मातु बचन सब भाए । जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए ।।
रामहि चितइ रहेउ नरनाहू । चला बिलोचन बारि प्रबाहू ।।
राम सरिस सुत कानन जोगू । काह कहिहि सुनि तुम्ह कहुँ लोगू ।।
राम उठाइ मातु उर लाई । कहि मृदु बचन बहुरि समुझाई ।।
राम प्रबोधु कीन्ह बिधि नाना । समउ सनेहु न जाइ बखाना ।।
राम बिलोकि बंधु कर जोरें । देह गेह सब सन तृनु तोरे ।।

रामु प्रानप्रिय जीवन जी के । स्वारथ रहित सखा सबही के ।।
रामु तुरत मुनि बेषु बनाई । चले जनक जननिहि सिरु नाई ।।
राम चलत अति भयउ बिषादू । सुनि न जाइ पुर आरत नादू ।।
रामु चले बन प्रान न जाहीं । केहि सुख लागि रहत तन माहीं ।।
राम बियोग बिकल सब ठाढ़े । जँह तँह  मनँहु चित्र लिखि काढ़े ।।
राम चरन पंकज प्रिय जिन्हही ।बिषय भोग बस करहिं  कि तिन्हही ।।

राम लखन सिय जान चढ़ि संभु चरन सिरु नाइ ।
सचिवँ चलायउ तुरत रथु इत उत खोज दुराइ ।।

राम दरस हित नेम ब्रत लगे करन नर नारि ।
मनहुँ कोक कोकी कमल दीन बिहीन तमारि ।।

राम लखन सिय रूप निहारी । कहहिं सप्रेम ग्राम नर नारी ।।

रामचंदु पति सो बैदेही । सोवत महि बिधि बाम न केही ।।

राम ब्रह्म परमारथ रूपा । अबिगत अलख अनादि अनूपा ।।
राम प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती । तदपि होति नहिं सीतलि छाती ।।

राम लखन सिय पद सिरु नाई । फिरेउ बनिक जिमि मूर गवाँई ।।
राम प्रनाम कीन्ह सब काहू । मुदित भए लहि लोयन लाहू ।।

राम कीन्ह बिश्राम निसि प्रात प्रयाग नहाइ ।
चले सहित सिय लखन जन मुदित मुनिहि सिरु नाइ ।।

राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं । नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं ।।

राम सप्रेम पुलकि उर लावा । परम रंक जनु पारसु पावा ।।
राम लखन सिय रूप निहारी । होहिं सनेह बिकल नर नारी ।।

राम लखन सिय रूप निहारी । पाइ नयन फलु होहिं सुखारी ।।

रामहि देखि एक अनुरागे । चितवत चले जाहिं सँग लागे ।।

राम लखन सिय सुंदरताई । सब चितवहिं चित मन मति लाई ।।
राम लखन पथि कथा सुहाई । रही सकल मग कानन छाई ।।
राम लखन सिय प्रीति सुहाई । बचन अगोचर किमि कहि जाई ।।
राम धाम पथ पाइहि सोई । जो पथ पाव कबहुँ मुनि कोई ।।
राम दीख मुनि बासु सुहावन । सुंदर गिरि काननु जलु पावन ।।

राम सरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर ।
अबिगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह ।।

राम देखि सुनि चरित तुम्हारे । जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे ।।

राम भगत प्रिय लागहिं जेही । तेहि उर बसहु सहित बैदेही ।।

राम प्रनामु कीन्ह सब काहू । मुदित देव लहि लोचन लाहू ।।
राम सनेह मगन सब जाने । कहि प्रिय बचन सकल सनमाने ।।

रामहि केवल प्रेमु पिआरा । जानि लेउ जो जाननिहारा ।।

राम सकल बनचर तब तोषे । कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे ।।
राम सँग सिय रहित सुखारी । पुर परिजन गृह सुरति बिसारी ।।

रामु लखन सीता सहित सोहत परन निकेत ।
जिमि बासव बस अमरपुर सची जयंत समेत ।।

राम राम सिय लखन पुकारी । परेउ धरनितल ब्याकुल भारी ।।

राम रहित रथ देखिहि जोई । सकुचिहि मोहि बिलोकत सोई ।।

राम जननि तब आइहि धाई । सुमिरि बच्छु जिमि धेनु लवाई ।।

राम राम कह राम सनेही । पुनि कह राम लखन बैदेही ।।

राम कुसल कहु सखा सनेही । कँह रघुनाथु लखन बैदेही ।।

राम रूप गुन सील सुभाऊ । सुमिरि सुमिरि उर सोचत राऊ ।।
राम सखा तब नाव मगाई । प्रिय चढ़ाइ चढ़े रघुराई ।।

राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम ।
तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम ।।

राम बिरोधी हृदय तें प्रगट कीन्ह बिधि मोहि ।
मो समान को पातकी बादि कहउँ कछु तोहि ।।

रामु लखनु सिय बनहि सिधाए । गइउँ न संग न प्रान पठाए ।।
राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे । तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु ते प्यारे ।।
राम पुनीत बिषय रस रूखे । लोलुप भूमि भोग के भूखे ।।
राम मातु सुठि सरलचित मो पर प्रेमु बिसेषि ।
कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि ।।

राम दरस बस सब नर नारी । जनु करि करिनि चले तकि बारी ।।

राम प्रताप नाथ बल तोरे । करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे ।

रामहि भरतु मनावन जाहीं । सगुन कहइ अस बिग्रहु नाहीं ।।

राम सखा सुनि संदनु त्यागा । चले उतरि उमगत अनुरागा ।।

राम राम कहि जे जमुहाहीं । तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं ।।

राम नाम महिमा सुर कहहीं । सुनि सुनि अवध लोग सुखु लहहीं ।।

रामसखहि मिलि भरत सप्रेम । पूँछी कुसल सुमंगल खेमा ।।

राम कीन्ह आपन जबही तें । भयउँ भुवन भूषन तबही तें ।।

रामघाट कँह कीन्ह प्रनामू । भा मनु मगनु मिले जनु रामू ।।

राम जनमि जगु कीन्ह उजागर । रूप सील सुख सब गुन सागर ।।

राम सुना दुखु कान न काऊ । जीवनतरु जिमि जोगवइ राऊ ।।

राम तुम्हहि प्रिय तुम्ह प्रिय रामहि । यह निरजोसु दोसु बिधि बामहि ।।

रामु पयादेहि पाँय सिधाए । हम कहँ रथ गज बाजि बनाए ।।

राम गवनु बन अनरथ मूला । जो सुनि सकल विस्व भइ सूला ।।

राम भगत अब अमिअँ अघाहूँ । कीन्हेहु सुलभ सुधा बसुधाहूँ ।।

राम बिरहँ तजि तनु छनभंगू । भूप सोच कर कवन प्रसंगू ।।
राम लखन सिय बिनु पग पनहीं । करि मुनि बेष फिरहिं बन बनहीं ।।

राम बिरह ब्याकुल भरतु सानुज सहित समाज ।
पहुनाई करि हरहु श्रम कहा मुदित मुनिराज ।।

रामसखा कर दीन्हें लागू । चलत देह धरि जनु अनुरागू ।।

राम बास थल बिटप बिलोकें । उर अनुराग रहत नहिं रोकें ।।
रामु संकोची प्रेम बस भरत सपेम पयोधि ।
बनी बात बेगरन चहति करिअ जतनु छलु सोधि ।।

राम सदा सेवक रूचि राखी । बेद पुरान साधु सुर साखी ।।

राम भगत परहित निरत पर दुःख दुखी दयाल ।
भगत सिरोमनि भरत तें जनि डरपहु सुरपाल ।।

रामसखाँ तेहि समय देखावा । सैल सिरोमनि सहज सुहावा ।।

राम निरादर कर फलु पाई । सोवहुँ समर सेज दोउ भाई ।।

रामु लखनु सिय सुनि मम नाऊँ । उठि जनि अनत जाहिं तजि ठाऊँ ।।

राम बास बन संपति भ्राजा । सुखी प्रजा जनु पाइ सुराजा ।।
राम सैल सोभा निरखि भरत हृदयँ अति पेमु ।
तापस तप फलु पाइ जिमि सुखी सिरानें नेमु ।।

रामसखा रिषि बरबस भेंटा । जनु महि लुठत सनेह समेटा ।।

राम बचन सुनि सभय समाजू । जनु जलनिधि मँहु बिकल जहाजू ।।

राम सैल बन देखन जाहीं । जँह सुख सकल सकल दुख नाही ।।

राम कृपाल निषाद नेवाजा । परिजन प्रजउ चहिअ जस राजा ।। 

राम दरस लालसा उछाहू । पथ श्रम लेसु कलेसु न काहू ।।

राम सनेह सरस मन जासू । साधु सभाँ बड़ आदर तासू ।।

राम सपथ मैं कीन्हि न काऊ । सो करि कहउँ सखी सत भाऊ ।।

रामु जाइ बनु करि सुर काजू । अचल अवधपुर करिहहिं राजू ।।

राम भरत गुन गनत सप्रीती । निसि दंपतिहि पलक सम बीती ।।

राम बचन गुरू नृपहि सुनाए । सील सनेह सुभायँ सुहाए ।।
रामहि राँय कहेउ बन जाना । कीन्ह आपु प्रिय प्रेम प्रवाना ।

राम सत्यब्रत धरम रत सब कर सीलु सनेहु ।
संकट सहत सकोच बस कहिअ जो आयसु देहु ।।

राम भगतिमय भरतु निहारे । सुर स्वारथी हहरि हियँ हारे ।।

रामु सनेह सकोच बस कह ससोच सुरराजु ।
रचहु प्रपंचहि पंच मिलि नाहिं त भयउ अकाजु ।

राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत ।
सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न ऊतरु देत ।।

राम रजाइ मेट मन माहीं । देखा सुना कतहुँ कोउ नहीं ।।

रामहि चितवत चित्र लिखे से । सकुचत बोलत बचन सिखे से ।।

राम मातु दुखु सुखु सम जानी । कहि गुन राम प्रबोधीं रानी ।।

रामकृपाँ अवरेब सुधारी । बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी ।।
राम दरस लगि लोग सब करत नेम उपबास ।
तजि तजि भूषन भोग सुख जिअत अवधि की आस ।।

राम मातु गुर पद सिरु नाई । प्रभु पद पीठ रजायसु पाई ।

राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति ।
चातक हंस सराहिअत टेक बिबेक बिभूति ।।

राम पेम बिधु अचल अदोषा । सहित समाज सोह नित चोखा ।।

राम बदनु बिलोक मुनि ठाढ़ा । मानहुँ चित्र माझ लिखि काढ़ा ।।

राम अनुज समेत बैदेही । निसि दिनु देव जपत हहु जेही ।।
राम राम कहि तनु तजहिं पावहिं पद निर्बान ।

करि उपाय रिपु मारे छन महुँ कृपानिधान ।।

राम रोष पावक अति घोरा । होइहि सकल सलभ कुल तोरा ।।

राम कहा तनु राखहु ताता । मुख मुसुकाइ कही तेहिं बाता ।।
राम सकल नामन्ह ते अधिका । होउ नाथ अघ खग गन बधिका ।

राम जबहिं प्रेरेउ निज माया । मोहेहु मोहि सुनहु रघुराया ।।
राम राम हा राम पुकारी । हमहि देखि दीन्हेउ पट डारी ।।

राम चरन दृढ़ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग ।

सुमन माल जिमि कंठ ते गिरत न जानइ नाग ।।

राम बालि निज धाम पठावा । नगर लोग सब ब्याकुल धावा ।।

राम कहा अनुजहि समुझाई । राज देहु सुग्रीवहि जाई ।।

राम काजु अरु मोर निहोरा । बानर जूथ जाहु चहुँ ओरा ।।
राम काज कारन तनु त्यागी । हरि पुर गयउ परम बड़भागी ।।
राम काज लगि तव अवतारा । सुनतहिं भयउ पर्बताकारा ।।
राम काजु करि फिरि मैं आवौं । सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं ।।
राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान ।

आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान ।।

रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ ।

नव तुलसिका बृंद तँह देखि हरष कपिराइ ।।

राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा । हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा ।।

रामचंद्र गुन बरनैं लागा । सुनतहिं सीता कर दुख भागा ।।

राम दूत मैं मातु जानकी । सत्य सपथ करुनानिधान की ।।

राम बान रबि उएँ जानकी । तम बरूथ कहँ जातुधान की ।।

राम चरन पंकज उर धरहू । लंका अचल राज तुम्ह करहू ।।

राम नाम बिनु गिरा न सोहा । देखु बिचारि त्यागि मद मोहा ।।

राम बिमुख संपति प्रभुताई । जाइ रही पाई बिनु पाई ।।

राम कपिन्ह जब आवत देखा । किएँ काजु मन हरष विसेषा ।।
राम कृपा बल पाइ कपिंदा । भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा ।।

राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक ।
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक ।।

रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि ।
मैं रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि ।।

राम बचन सुनि बानर जूथा । सकल कहहिं जय कृपा बरूथा ।।
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं । तृन समान त्रैलोकहि  गनहीं ।।
राम तेज बल बुधि बिपुलाई । शेष सहस सत सकहिं न गाई ।।
रामानुज दीन्ही यह पाती । नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती ।।

रामं कामारिसेब्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं ।
योग्रीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम् ।।

राम प्रताप सुमिरि मन माहीं । करहु सेतु प्रयास कछु नाहीं ।।
राम चरन पंकज उर धरहू । कौतुक एक भालु कपि करहू ।।
राम बचन सब के जिय भाए । मुनिबर निज निज आश्रम आए ।।

रामहि सौपिं जानकी नाइ कमल पद माथ ।
सुत कहुँ राज समर्पि बन जाइ भजिअ रघुनाथ ।।

राम बिरोध कुसल जसि होई । सो सब तोहि सुनाइहि सोई ।।
राम मनुज कस रे सठ बंगा । धन्वी कामु नदी पुनि गंगा ।।
रामु मनुज बोलत असि बानी । गिरहिं न तव रसना अभिमानी ।।
रामानुज लघु रेख खचाई । सोउ नहिं नाघेहु असि मनुसाई ।।
राम प्रताप प्रबल कपिजूथा । मर्दहिं निसिचर सुभट बरूथा ।।
राम कृपा करि जुगल निहारे । भए बिगतश्रम परम सुखारे ।।
राम कृपा करि चितवा सबही । भए बिगतश्रम बानर तबही ।।

राम पदारबिंद सिर नायउ आइ सुषेन ।
कहा नाम गिरि औषधी जाहु पवनसुत लेन ।।

राम चरन सरसिज उर राखी । चला प्रभंजनसुत बल भाषी ।।
राम राम कहि छाड़ेसि प्राना । सुनि मन हरषि चलेउ हनुमाना ।।
राम प्रभाव बिचारि बहोरी । बंदि चरन कह कपि कर जोरी ।।

राम रूप गुन सुमिरत मगन भयउ छन एक ।
रावन मागेउ कोटि घट मद अरु महिष अनेक ।।

राम सेन निज पाछे घाली । चले सकोप महा बलसाली ।।
राम कृपाँ कपि दल बल बाढ़ा । जिमि तृन पाइ लाग अति डाढ़ा ।।

रामानुज कहँ राम कहँ अस कहि छाड़ेसि प्रान ।
धन्य धन्य तव जननी कह अंगद हनुमान ।।

राम बचन सुनि बिहँसा मोहि सिखावत ग्यान ।
बयरु करत नहिं तब डरे अब लागे प्रिय प्रान ।।

राम कृपा करि सूत उठावा । तब प्रभु परम क्रोध कहुँ पावा ।।
राम बिमुख सठ चहसि संपदा । अस कहि हनेसि माझ उर गदा ।।
राम सुभाव सुमिरि बैदेही । उपजी बिरह बिथा अति तेही ।।
राम बिमुख अस हाल तुम्हारा । रहा न कोउ कुल रोवनिहारा ।।
रामाकार भए तिन्ह के मन । मुक्त भए छूटे भव बंधन ।।
राम सरिस को दीन हितकारी। कीन्हे मुकुत निसाचर झारी।।

राम बिरह सागर मँह भरत मगन मन होत ।
बिप्र रूप धरि पवनसुत आइ गयउ जनु पोत ।।

राम प्रान प्रिय नाथ तुम्ह सत्य बचन मम तात
पुनि पुनि मिलत भरत सुनि हरष न हृदयँ समात ।।

राम कहा सेवकन्ह बुलाई । प्रथम सखन्ह अन्हवावहु जाई।
राम बाम दिसि सोभति रमा रूप गुन खानि ।
देखि मातु सब हरषीं जन्म सुफल निज जानि ।।

राम बिलोकनि बोलनि चलनी । सुमिरि सुमिरि सोचत हँसि मिलनी ।।
राम राज बैठे त्रैलोका । हरषित भए गए सब सोका ।।
राम भगति रत नर अरु नारी । सकल परम गति के अधिकारी ।।

राम राज नभगेस सुनु सचराचर जग माहिं ।
काल कर्म सुभाव गुन कृत दुख काहुहि नाहिं ।।

राम राज कर सुख संपदा । बरनि न सकइ फनीस सारदा ।।
राम करहिं भ्रातन्ह पर प्रीती । नाना भाँति सिखावहिं नीती ।।
राम कथा मुनिबर बहु बरनी । ग्यान जोनि पावक जिमि अरनी ।।
राम सुनहु मुनि कह कर जोरी । कृपासिंधु बिनती कछु मोरी ।।
राम चरित सत कोटि अपारा । श्रुति सारदा न बरनै पारा ।।
राम अनंत अनंत गुनानी । जन्म कर्म अनंत नामानी ।।
राम चरित जे सुनत अघाहीं । रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं ।।

राम परायन ग्यान रत गुनागार मति धीर ।
नाथ कहहु केहि कारन पायउ काक सरीर  ।।

राम चरित बिचित्र बिधि नाना। प्रेम सहित कर सादर गाना।
राम भगति पथ परम प्रबीना । ग्यानी गुन गृह बहु कालीना।।
राम कथा सो कहइ निरंतर । सादर सुनहिं बिबिधि बिहंगबर ।।
राम कृपाँ तव दरसन भयऊ।तव प्रसाद सब संसय गयऊ।

राम कृपा भाजन तुम्ह ताता । हरि गुन प्रीति मोहि सुखदाता ।।
राम कृपा आपनि जड़ताई ।कहउँ खगेस सुनहु मन लाई ।।

रामचंद्र के भजन बिनु जो चह पद निर्वान ।
ग्यानवंत अपि सो नर पसु बिनु पूँछ बिषान ।।

राम उदर देखेउँ जग नाना । देखत बनइ न जाइ बखाना ।।
राम प्रसाद भगति बर पायउँ । प्रभु पद बंदि निजाश्रम आयउँ ।।
राम कृपा बिनु सुनु खगराई । जानि न जाइ राम प्रभुताई ।।
राम भजन बिनु मिटहिं न कामा । थल बिहीन तरु कबहुँ कि जामा ।।
रामु काम सत कोटि सुभग तन । दुर्गा कोटि अमित अरि मर्दन ।।

रामु अमित गुनसागर थाह कि पावइ कोइ ।
संतन्ह सन जस किछु सुनेउँ तुम्हहि सुनायँउ सोइ ।।

राम चरित सर सुंदर स्वामी । पायहु कहाँ कहहु नभगामी।राम बिमुख लहि बिधि सम देही । कबि कोबिद न प्रसंसहि तेही ।।
राम भगति एहिं तन उर जामी। ताते मोहि परम प्रिय स्वामी ।।
रामहि भजहिं तात सिव धाता।नर पावँर कै केतिक बाता।।
राम चरन बारिज जब देखौं । तब निज जन्म सफल करि लेखौं ।।

राम भगति जल मम मन मीना । किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना ।।
रामचरित सर गुप्त सुहावा । संभु प्रसाद तात मैं पावा ।।
राम भगति जिन्ह के उर नाहीं । कबहुँ न तात कहिअ तिन्ह पाही ।।
राम भगति अबिरल उर तोरे । बसिहि सदा प्रसाद अब मोरे
राम रहस्य ललित बिधि नाना। गुप्त प्रगट इतिहास पुराना।।
राम भगति निरुपम निरुपाधी । बसइ जासु उर सदा अबाधी ।।
राम भजत सोइ मुकुति गोसाई । अनइच्छित आवइ बरिआई ।।
राम भगति चिंतामनि सुंदर । बसइ गरुड़ जाके उर अंतर।।

राम भगति मनि उर बस जाके । दुख लवलेस न सपनेहुँ ताके ।।
राम सिंधु घन सज्जन धीरा । चंदन तरु हरि संत समीरा ।।
राम कृपाँ नासहिं सब रोगा । जौं एहि भाँति बनै संजोगा ।।
राम चरन नूतन रति भई । माया जनित बिपति सब गई ।।
राम कथा के तेइ अधिकारी । जिन्ह के सत संगति अति प्यारी ।।

राम चरन रति जो चह अथवा पद निर्बान ।
भाव सहित सो यह कथा करउ श्रवन पुट पान ।।

राम कथा गिरिजा मैं बरनी । कलि मल समनि मनोमल हरनी ।।
राम उपासक जे जग माहीं । एहि सम प्रिय तिन्ह के कछु नाहीं ।।

                   जय श्री राम

संकलन कर्ता
डॉ विदुषी शर्मा

रामचरितमानस में "राम" से आरंभ होने वाली चौपाईयां और दोहे तथा इनका महत्व ।

मानस प्रेमी ही जान पायेगें कि तुलसीदास जी  ने कितना परिश्रम किया होगा, इस प्रस्तुति को संकलित करने में, हम कलयुगी जीव केवल इन्हें पढ़कर ही अपना जीवन सफल कर सकते हैं क्योंकि इन सब में "राम" है और जहाँ "राम" हैं वहां प्रेम है, भक्ति है, समर्पण है, विश्वास है, श्रद्धा है, त्याग है, मर्यादा है , करूणा है,और जब इतने सकारात्मक गुण  हमारे जीवन में एक साथ आ जाते हैं तो फिर वह जीवन वास्तव में ही सार्थक हो जाता है क्योंकि इन सब का किसी के भी जीवन में आना एक विशुद्ध चरित्र को जन्म देता है, यानी किसी भी मनुष्य के जीवन में यह सब गुण जब आ जाते हैं तो वह चरित्र  निश्चल, विनम्र, और विशुद्ध, आत्मीय तथा प्रभु के सामिप्य को प्राप्त करने वाला हो जाता है,  और कहते भी है ना

'राम से बड़ा राम का नाम' और

"कलयुग केवल नाम अधारा,
सिमर सिमर नर उतरहिं पारा।

और जहां "राम" हैं वहां सब कुछ है।
इसलिए यदि इन चौपाइयों के अर्थ हमें ना भी समझ में आए तो केवल पढ़ने भर से हमारे जीवन का उद्धार संभव है आवश्यकता है तो केवल विश्वास की, आस्था की, भक्ति की, प्रेम की और समर्पण की।

श्रीरामचरितमानस में श्रीरामनाम से प्रारंभ होने वाले दोहे और चौपाइयाँ!!!!!!
                   ।। श्री गणेशाय नमः ।।

           ।। राम श्रीराम श्रीराम श्रीराम ।।

राम भक्ति जँह सुरसरि धारा सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा ।।
राम भगति भूषित जियँ जानी। सुनिहहिं सुजन सराहि सुबानी ।।
राम चरित सर बिनु अन्हवाएँ । सो श्रम जाइ न कोटि उपाएँ ।।
राम सुकीरति  भनिति भदेसा । असमंजस अस मोहि अँदेसा ।।
राम चरन पंकज  मन जासू । लुबुध मधुप इव तजइ न पासू ।।

राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार ।
तुलसी भीतर बाहरेहुँ जौ चाहसि उजिआर ।।

राम भगत जग चारि प्रकारा। सुकृती चारिउ अनघ उदारा।
राम भगत हित नर तनु धारी । सहि संकट किए साधु सुखारी ।।
राम एक तापस तिय तारी । नाम कोटि खल कुमति सुधारी ।।
राम सुकंठ बिभीषन दोऊ । राखे सरन जान सबु कोऊ ।।
राम भालु कपि कटकु बटोरा । सेतु हेतु श्रमु कीन्ह न थोरा ।।
राम सकुल रन रावनु मारा । सीय सहित निज पुर पगु धारा ।।
राम नाम कलि अभिमत दाता । हित परलोक लोक पितु माता ।।

राम नाम नरकेसरी कनककसिपु कलिकाल ।
जापक जन प्रहलाद जिमि पालिह दलि सुरसाल ।।

राम सुस्वामि कुसेवक मोसो । निज दिसि देखि दयानिधि पोसो ।।

राम निकाई रावरी है सबही को नीक ।
जौ यह साँची है सदा तौ नीको तुलसीक ।।

रामकथा कलि पनंग भरनी । पुनि बिबेक पावक कहुँ अरनी ।।
रामकथा कलि कामद गाई । सुजन सजीवनि मूरि सुहाई ।।
रामहि प्रिय पावनि तुलसी सी । तुलसिदास हित हियँ हुलसी सी ।।

रामकथा मंदाकिनी चित्रकूट चित चारु ।
तुलसी सुभग सनेह बन सिय रघुबीर बिहारु ।।

रामचरित चिंतामनि चारू । संत सुमति तिय सुभग सिंगारू ।।
रामचरित राकेस कर सरिस सुखद सब काहु ।
सज्जन कुमुद चकोर चित हित बिसेषि बड़ लाहु ।।

रामकथा कै मिति जग नाहीं । असि प्रतीति तिन्ह के मन माहीं ।।

राम अनंत अनंत गुन अमित कथा विस्तार ।
सुनि आचरजु न मानिहहिं जिन्ह के बिमल बिचार ।।

राम धामदा पुरी सुहावनि । लोक समस्त बिदिति अति पावन ।।
रामचरितमानस एहि नामा । सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा ।।
रामचरितमानस मुनि भावन । बिरचेउ संभु सुहावन पावन ।।
राम सीय जस सलिल सुधासम । उपमा बीचि बिलास मनोरम ।।
रामभगति सुरसरितहि जाई । मिली सुकीरति सरजु सुहाई ।।
राम तिलक हित मंगल साजा । परब जोग जनु जुरे समाजा ।।
राम राज सुख विनय बड़ाई । बिसद सुखद सोइ  सरद सुहाई ।।
राम सुप्रेमहि पोषत पानी । हरत सकल कलि कलुष गलानी ।।
राम नाम कर अमित प्रभावा । संत पुरान उपनिषद गावा ।।
रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही । कहिअ बुझाइ कृपानिधि मोही ।।
रामभगत तुम्ह मन क्रम बानी । चतुराई तुम्हारि मैं जानी ।।
रामकथा ससि किरन समाना । संत चकोर करहिं जेहि पाना ।।
रामकथा मुनिबर्ज बखानी । सुनी महेस परम सुख मानी ।।

राम बचन मृदु गूढ़ सुनि उपजा अति संकोचु ।
सती सभीत महेस पहिं चलीं ह्रदयँ बड़ सोचु ।।

राम नाम सिव सुमिरन लागे । जानेउ सतीं जगतपति जागे।
राम चरित अति अमित मुनीसा । कहि न सकहिं सत कोटि अहीसा ।।
रामु सो अवध नृपति सुत सोई । की अज अगुन अलखगति कोई ।।

राम कृपा तें पारबति सपनेहुँ तव मन माहिं ।
सोक मोह संदेह भ्रम मम बिचार कछु नाहिं ।।

रामकथा सुरधेनु सम सेवत सब सुख दानि ।
सतसमाज सुरलोक सब को न सुनै अस जानि ।।

रामकथा सुंदर कर तारी । संसय बिहग उड़ावनिहारी ।।
रामकथा कलि बिटप कुठारी । सादर सुनु गिरिराजकुमारी।
राम नाम गुन चरित सुहाए । जनम करम अगनित श्रुति गाए ।।
राम सच्चिदानन्द दिनेसा । नहिं तँह मोह निसा लवलेसा ।।
राम ब्रह्म ब्यापक जग जाना । परमानंद परेस पुराना ।।
राम सो परमातमा भवानी । तँह  भ्रम अति अबिहित तव बानी ।।
राम ब्रह्म चिनमय अबिनासी । सर्ब रहित सब उर पुर बासी ।।
राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी । मत हमार अस सुनहि सयानी ।।
राम जनम के हेतु अनेका । परम बिचित्र एक ते एका ।।
राम कीन्ह चाहहिं सोइ होई । करै अन्यथा अस नहिं कोई।
रामचन्द्र के चरित सुहाए । कलप कोटि लगि जाहिं न गाए।

रामु लखनु दोउ बंधुबर रूप सील बल धाम ।
मख राखेउ सबु साखि जगु जिते असुर संग्राम ।।

राम अनुज मन की गति जानी । भगत बछलता हियँ हुलसानी ।।
राम देखावहिं अनुजहि रचना । कहि मृदु मधुर मनोहर बचना ।।
राम कहा सब कौसिक पाहीं । सरल सुभाव छुअत छल नाहीं ।।
रामहि चितव भाँय जेहि सीया । सो सनेहु सुखु नहिं कथनीया ।।
राम रूप अरु सिय छबि देखें।नर नारिन्ह परिहरीं निमेषें।।

रामहि प्रेम समेत लखि सखिन्ह समीप बोलाइ ।
सीता मातु सनेह बस बचन कहइ बिलखाइ ।।

राम चहहिं संकर धनु तोरा।होहु सजग सुनि आयसु  मोरा।
राम बाहुबल सिंधु अपारू।चहत पारु नहिं कोउ कड़हारू।

राम बिलोके लोग सब चित्र लिखे से देखि ।
चितई सीय कृपायतन जानी बिकल बिसेषि ।।

रामरूप राकेसु निहारी । बढ़त बीचि पुलकावलि भारी ।।
रामहि लखनु बिलोकत कैसें । ससिहि चकोर किसोरकु जैसें ।।
रामु सुभाँय चले गुरू पाहीं । सिय सनेहु बरनत मन माहीं।
रामु लखन दसरथ के ढोटा । दीन्हि असीस देखि भल जोटा ।।
रामहि चितइ रहे थकि लोचन । रूप अपार मार मद मोचन।

राम बचन सुनि कछुक जुड़ाने । कहि कछु लखन बहुरि मुसुकाने ।।
राम कहेउ रिस तजिअ मुनीसा । कर कुठारू आगें यह सीसा ।।
राम मात्र लघु नाम हमारा । परसु सहित बड़ नाम तोहारा।
राम कहा मुनि कहहु बिचारी । रिस अति बड़ि लघु चूक हमारी ।।
राम रमापति कर धनु लेहू । खैंचहु मिटै मोर संदेहू ।।
रामु लखनु उर कर बर चीठी । रहि गए कहत न खाटी मीठी ।।

राम लखन कै कीरति करनी । बारहिं बार भूपबर बरनी ।।
राम सरिस बरु दुलहिनि सीता । समधी दसरथु जनकु पुनीता ।।
रामहि देखि बरात जुड़ानी । प्रीति कि रीति न जाति  बखानी ।।


रामु सीय सोभा अवधि सुकृत अवधि दोउ राज ।
जँह तँह पुरजन कहहिं अस मिलि नर नारि समाज ।।

राम रूपु नख सिख सुभग बारहिं बार निहारि ।
पुलक गात लोचन सजल उमा समेत पुरारि ।।

रामहि चितव सुरेस सुजाना गौतम श्रापु परम हित माना।

रामचंद्र मुख चंद्र छबि लोचन चारु चकोर ।
करत पान सादर सकल प्रेमु प्रमोदु न थोर ।।

राम सीय सुंदर प्रतिछाहीं । जगमगात मनि खंभन माहीं ।।
राम सीय सिर सेंदुर देहीं।सोभा कहि न जाति बिधि कहीं।
राम बिदा मागत कर जोरी । कीन्ह प्रनामु बहोरि बहोरी ।।
राम करौं केहि भाँति प्रसंसा।मुनि महेस मन मानस हंसा ।।
रामहि निरखि ग्राम नर नारी।पाइ नयन फलु होहिं सुखारी।
राम दरस हित अति अनुरागीं । परिछनि साजु सजन सब लागीं ।।
रामहि देखि रजायसु पाई।निज निज भवन चले सिर नाई।

राम प्रतोषीं मातु सब कहि बिनीत बर वैन ।
सुमिरि संभु गुर बिप्र पद किए नीदबस नैन ।।

रामु सप्रेंम संग सब भाई । आयसु पाइ फिरे पहुँचाई ।।

राम रूपु भूपति भगति ब्याहु उछाहु अनंदु ।
जात सराहत मनहिं मन मुदित गाधिकुलचंदु ।।

राम रूपु गुन सील सुभाऊ । प्रमुदित होइ देखि सुनि राऊ।
राम सीय तन सगुन जनाए । फरकहिं मंगल अंग सुहाए ।।
रामहि बंधु सोच दिन राती । अंडन्हि कमठ हृदउ जेहि भाँती ।।

राम राज अभिषेकु सुनि हियँ हरषे नर नारि ।
लगे सुमंगल सजन सब बिधि अनुकूल बिचारि ।।

राम करहु सब संजम आजू । जौ बिधि कुसल निबाहै काजू ।।
रामहि छाड़ि कुसल केहि आजू । जेहि जनेसु देइ जुबराजू ।।
राम तिलकु जौं साँचेहुँ काली । देउँ मागु मन भावत आली ।।
रामहि तिलक कालि जौं भयऊ ।  तुम्ह कहुँ बिपति बीजु बिधि बयऊ ।।
रामहि देउँ कालि जुबराजू । सजहि सुलोचनि मंगल साजू ।।
राम सपथ सत कहँउ सुभाऊ । राममातु कछु कहेउ न काऊ ।।
रामु साधु तुम्ह साधु सयाने । राममातु भलि सब पहिचाने ।।
राम राम रट बिकल भूआलू । जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू ।।
राम सुमंत्रहि आवत देखा । आदरु कीन्ह पिता सम लेखा ।।

रामु कुभाँति सचिव संग जाहीं । देखि लोग जँह तँह बिलखाहीं ।।
राम सत्य सबु जो कछु कहहू ।  तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू ।। 
रामहि मातु बचन सब भाए । जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए ।।
रामहि चितइ रहेउ नरनाहू । चला बिलोचन बारि प्रबाहू ।।
राम सरिस सुत कानन जोगू । काह कहिहि सुनि तुम्ह कहुँ लोगू ।।
राम उठाइ मातु उर लाई । कहि मृदु बचन बहुरि समुझाई ।।
राम प्रबोधु कीन्ह बिधि नाना । समउ सनेहु न जाइ बखाना ।।
राम बिलोकि बंधु कर जोरें । देह गेह सब सन तृनु तोरे ।।

रामु प्रानप्रिय जीवन जी के । स्वारथ रहित सखा सबही के ।।
रामु तुरत मुनि बेषु बनाई । चले जनक जननिहि सिरु नाई ।।
राम चलत अति भयउ बिषादू । सुनि न जाइ पुर आरत नादू ।।
रामु चले बन प्रान न जाहीं । केहि सुख लागि रहत तन माहीं ।।
राम बियोग बिकल सब ठाढ़े । जँह तँह  मनँहु चित्र लिखि काढ़े ।।
राम चरन पंकज प्रिय जिन्हही ।बिषय भोग बस करहिं  कि तिन्हही ।।

राम लखन सिय जान चढ़ि संभु चरन सिरु नाइ ।
सचिवँ चलायउ तुरत रथु इत उत खोज दुराइ ।।

राम दरस हित नेम ब्रत लगे करन नर नारि ।
मनहुँ कोक कोकी कमल दीन बिहीन तमारि ।।

राम लखन सिय रूप निहारी । कहहिं सप्रेम ग्राम नर नारी ।।

रामचंदु पति सो बैदेही । सोवत महि बिधि बाम न केही ।।

राम ब्रह्म परमारथ रूपा । अबिगत अलख अनादि अनूपा ।।
राम प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती । तदपि होति नहिं सीतलि छाती ।।

राम लखन सिय पद सिरु नाई । फिरेउ बनिक जिमि मूर गवाँई ।।
राम प्रनाम कीन्ह सब काहू । मुदित भए लहि लोयन लाहू ।।

राम कीन्ह बिश्राम निसि प्रात प्रयाग नहाइ ।
चले सहित सिय लखन जन मुदित मुनिहि सिरु नाइ ।।

राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं । नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं ।।

राम सप्रेम पुलकि उर लावा । परम रंक जनु पारसु पावा ।।
राम लखन सिय रूप निहारी । होहिं सनेह बिकल नर नारी ।।

राम लखन सिय रूप निहारी । पाइ नयन फलु होहिं सुखारी ।।

रामहि देखि एक अनुरागे । चितवत चले जाहिं सँग लागे ।।

राम लखन सिय सुंदरताई । सब चितवहिं चित मन मति लाई ।।
राम लखन पथि कथा सुहाई । रही सकल मग कानन छाई ।।
राम लखन सिय प्रीति सुहाई । बचन अगोचर किमि कहि जाई ।।
राम धाम पथ पाइहि सोई । जो पथ पाव कबहुँ मुनि कोई ।।
राम दीख मुनि बासु सुहावन । सुंदर गिरि काननु जलु पावन ।।

राम सरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर ।
अबिगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह ।।

राम देखि सुनि चरित तुम्हारे । जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे ।।

राम भगत प्रिय लागहिं जेही । तेहि उर बसहु सहित बैदेही ।।

राम प्रनामु कीन्ह सब काहू । मुदित देव लहि लोचन लाहू ।।
राम सनेह मगन सब जाने । कहि प्रिय बचन सकल सनमाने ।।

रामहि केवल प्रेमु पिआरा । जानि लेउ जो जाननिहारा ।।

राम सकल बनचर तब तोषे । कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे ।।
राम सँग सिय रहित सुखारी । पुर परिजन गृह सुरति बिसारी ।।

रामु लखन सीता सहित सोहत परन निकेत ।
जिमि बासव बस अमरपुर सची जयंत समेत ।।

राम राम सिय लखन पुकारी । परेउ धरनितल ब्याकुल भारी ।।

राम रहित रथ देखिहि जोई । सकुचिहि मोहि बिलोकत सोई ।।

राम जननि तब आइहि धाई । सुमिरि बच्छु जिमि धेनु लवाई ।।

राम राम कह राम सनेही । पुनि कह राम लखन बैदेही ।।

राम कुसल कहु सखा सनेही । कँह रघुनाथु लखन बैदेही ।।

राम रूप गुन सील सुभाऊ । सुमिरि सुमिरि उर सोचत राऊ ।।
राम सखा तब नाव मगाई । प्रिय चढ़ाइ चढ़े रघुराई ।।

राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम ।
तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम ।।

राम बिरोधी हृदय तें प्रगट कीन्ह बिधि मोहि ।
मो समान को पातकी बादि कहउँ कछु तोहि ।।

रामु लखनु सिय बनहि सिधाए । गइउँ न संग न प्रान पठाए ।।
राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे । तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु ते प्यारे ।।
राम पुनीत बिषय रस रूखे । लोलुप भूमि भोग के भूखे ।।
राम मातु सुठि सरलचित मो पर प्रेमु बिसेषि ।
कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि ।।

राम दरस बस सब नर नारी । जनु करि करिनि चले तकि बारी ।।

राम प्रताप नाथ बल तोरे । करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे ।

रामहि भरतु मनावन जाहीं । सगुन कहइ अस बिग्रहु नाहीं ।।

राम सखा सुनि संदनु त्यागा । चले उतरि उमगत अनुरागा ।।

राम राम कहि जे जमुहाहीं । तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं ।।

राम नाम महिमा सुर कहहीं । सुनि सुनि अवध लोग सुखु लहहीं ।।

रामसखहि मिलि भरत सप्रेम । पूँछी कुसल सुमंगल खेमा ।।

राम कीन्ह आपन जबही तें । भयउँ भुवन भूषन तबही तें ।।

रामघाट कँह कीन्ह प्रनामू । भा मनु मगनु मिले जनु रामू ।।

राम जनमि जगु कीन्ह उजागर । रूप सील सुख सब गुन सागर ।।

राम सुना दुखु कान न काऊ । जीवनतरु जिमि जोगवइ राऊ ।।

राम तुम्हहि प्रिय तुम्ह प्रिय रामहि । यह निरजोसु दोसु बिधि बामहि ।।

रामु पयादेहि पाँय सिधाए । हम कहँ रथ गज बाजि बनाए ।।

राम गवनु बन अनरथ मूला । जो सुनि सकल विस्व भइ सूला ।।

राम भगत अब अमिअँ अघाहूँ । कीन्हेहु सुलभ सुधा बसुधाहूँ ।।

राम बिरहँ तजि तनु छनभंगू । भूप सोच कर कवन प्रसंगू ।।
राम लखन सिय बिनु पग पनहीं । करि मुनि बेष फिरहिं बन बनहीं ।।

राम बिरह ब्याकुल भरतु सानुज सहित समाज ।
पहुनाई करि हरहु श्रम कहा मुदित मुनिराज ।।

रामसखा कर दीन्हें लागू । चलत देह धरि जनु अनुरागू ।।

राम बास थल बिटप बिलोकें । उर अनुराग रहत नहिं रोकें ।।
रामु संकोची प्रेम बस भरत सपेम पयोधि ।
बनी बात बेगरन चहति करिअ जतनु छलु सोधि ।।

राम सदा सेवक रूचि राखी । बेद पुरान साधु सुर साखी ।।

राम भगत परहित निरत पर दुःख दुखी दयाल ।
भगत सिरोमनि भरत तें जनि डरपहु सुरपाल ।।

रामसखाँ तेहि समय देखावा । सैल सिरोमनि सहज सुहावा ।।

राम निरादर कर फलु पाई । सोवहुँ समर सेज दोउ भाई ।।

रामु लखनु सिय सुनि मम नाऊँ । उठि जनि अनत जाहिं तजि ठाऊँ ।।

राम बास बन संपति भ्राजा । सुखी प्रजा जनु पाइ सुराजा ।।
राम सैल सोभा निरखि भरत हृदयँ अति पेमु ।
तापस तप फलु पाइ जिमि सुखी सिरानें नेमु ।।

रामसखा रिषि बरबस भेंटा । जनु महि लुठत सनेह समेटा ।।

राम बचन सुनि सभय समाजू । जनु जलनिधि मँहु बिकल जहाजू ।।

राम सैल बन देखन जाहीं । जँह सुख सकल सकल दुख नाही ।।

राम कृपाल निषाद नेवाजा । परिजन प्रजउ चहिअ जस राजा ।। 

राम दरस लालसा उछाहू । पथ श्रम लेसु कलेसु न काहू ।।

राम सनेह सरस मन जासू । साधु सभाँ बड़ आदर तासू ।।

राम सपथ मैं कीन्हि न काऊ । सो करि कहउँ सखी सत भाऊ ।।

रामु जाइ बनु करि सुर काजू । अचल अवधपुर करिहहिं राजू ।।

राम भरत गुन गनत सप्रीती । निसि दंपतिहि पलक सम बीती ।।

राम बचन गुरू नृपहि सुनाए । सील सनेह सुभायँ सुहाए ।।
रामहि राँय कहेउ बन जाना । कीन्ह आपु प्रिय प्रेम प्रवाना ।

राम सत्यब्रत धरम रत सब कर सीलु सनेहु ।
संकट सहत सकोच बस कहिअ जो आयसु देहु ।।

राम भगतिमय भरतु निहारे । सुर स्वारथी हहरि हियँ हारे ।।

रामु सनेह सकोच बस कह ससोच सुरराजु ।
रचहु प्रपंचहि पंच मिलि नाहिं त भयउ अकाजु ।

राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत ।
सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न ऊतरु देत ।।

राम रजाइ मेट मन माहीं । देखा सुना कतहुँ कोउ नहीं ।।

रामहि चितवत चित्र लिखे से । सकुचत बोलत बचन सिखे से ।।

राम मातु दुखु सुखु सम जानी । कहि गुन राम प्रबोधीं रानी ।।

रामकृपाँ अवरेब सुधारी । बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी ।।
राम दरस लगि लोग सब करत नेम उपबास ।
तजि तजि भूषन भोग सुख जिअत अवधि की आस ।।

राम मातु गुर पद सिरु नाई । प्रभु पद पीठ रजायसु पाई ।

राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति ।
चातक हंस सराहिअत टेक बिबेक बिभूति ।।

राम पेम बिधु अचल अदोषा । सहित समाज सोह नित चोखा ।।

राम बदनु बिलोक मुनि ठाढ़ा । मानहुँ चित्र माझ लिखि काढ़ा ।।

राम अनुज समेत बैदेही । निसि दिनु देव जपत हहु जेही ।।
राम राम कहि तनु तजहिं पावहिं पद निर्बान ।

करि उपाय रिपु मारे छन महुँ कृपानिधान ।।

राम रोष पावक अति घोरा । होइहि सकल सलभ कुल तोरा ।।

राम कहा तनु राखहु ताता । मुख मुसुकाइ कही तेहिं बाता ।।
राम सकल नामन्ह ते अधिका । होउ नाथ अघ खग गन बधिका ।

राम जबहिं प्रेरेउ निज माया । मोहेहु मोहि सुनहु रघुराया ।।
राम राम हा राम पुकारी । हमहि देखि दीन्हेउ पट डारी ।।

राम चरन दृढ़ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग ।

सुमन माल जिमि कंठ ते गिरत न जानइ नाग ।।

राम बालि निज धाम पठावा । नगर लोग सब ब्याकुल धावा ।।

राम कहा अनुजहि समुझाई । राज देहु सुग्रीवहि जाई ।।

राम काजु अरु मोर निहोरा । बानर जूथ जाहु चहुँ ओरा ।।
राम काज कारन तनु त्यागी । हरि पुर गयउ परम बड़भागी ।।
राम काज लगि तव अवतारा । सुनतहिं भयउ पर्बताकारा ।।
राम काजु करि फिरि मैं आवौं । सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं ।।
राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान ।

आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान ।।

रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ ।

नव तुलसिका बृंद तँह देखि हरष कपिराइ ।।

राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा । हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा ।।

रामचंद्र गुन बरनैं लागा । सुनतहिं सीता कर दुख भागा ।।

राम दूत मैं मातु जानकी । सत्य सपथ करुनानिधान की ।।

राम बान रबि उएँ जानकी । तम बरूथ कहँ जातुधान की ।।

राम चरन पंकज उर धरहू । लंका अचल राज तुम्ह करहू ।।

राम नाम बिनु गिरा न सोहा । देखु बिचारि त्यागि मद मोहा ।।

राम बिमुख संपति प्रभुताई । जाइ रही पाई बिनु पाई ।।

राम कपिन्ह जब आवत देखा । किएँ काजु मन हरष विसेषा ।।
राम कृपा बल पाइ कपिंदा । भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा ।।

राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक ।
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक ।।

रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि ।
मैं रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि ।।

राम बचन सुनि बानर जूथा । सकल कहहिं जय कृपा बरूथा ।।
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं । तृन समान त्रैलोकहि  गनहीं ।।
राम तेज बल बुधि बिपुलाई । शेष सहस सत सकहिं न गाई ।।
रामानुज दीन्ही यह पाती । नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती ।।

रामं कामारिसेब्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं ।
योग्रीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम् ।।

राम प्रताप सुमिरि मन माहीं । करहु सेतु प्रयास कछु नाहीं ।।
राम चरन पंकज उर धरहू । कौतुक एक भालु कपि करहू ।।
राम बचन सब के जिय भाए । मुनिबर निज निज आश्रम आए ।।

रामहि सौपिं जानकी नाइ कमल पद माथ ।
सुत कहुँ राज समर्पि बन जाइ भजिअ रघुनाथ ।।

राम बिरोध कुसल जसि होई । सो सब तोहि सुनाइहि सोई ।।
राम मनुज कस रे सठ बंगा । धन्वी कामु नदी पुनि गंगा ।।
रामु मनुज बोलत असि बानी । गिरहिं न तव रसना अभिमानी ।।
रामानुज लघु रेख खचाई । सोउ नहिं नाघेहु असि मनुसाई ।।
राम प्रताप प्रबल कपिजूथा । मर्दहिं निसिचर सुभट बरूथा ।।
राम कृपा करि जुगल निहारे । भए बिगतश्रम परम सुखारे ।।
राम कृपा करि चितवा सबही । भए बिगतश्रम बानर तबही ।।

राम पदारबिंद सिर नायउ आइ सुषेन ।
कहा नाम गिरि औषधी जाहु पवनसुत लेन ।।

राम चरन सरसिज उर राखी । चला प्रभंजनसुत बल भाषी ।।
राम राम कहि छाड़ेसि प्राना । सुनि मन हरषि चलेउ हनुमाना ।।
राम प्रभाव बिचारि बहोरी । बंदि चरन कह कपि कर जोरी ।।

राम रूप गुन सुमिरत मगन भयउ छन एक ।
रावन मागेउ कोटि घट मद अरु महिष अनेक ।।

राम सेन निज पाछे घाली । चले सकोप महा बलसाली ।।
राम कृपाँ कपि दल बल बाढ़ा । जिमि तृन पाइ लाग अति डाढ़ा ।।

रामानुज कहँ राम कहँ अस कहि छाड़ेसि प्रान ।
धन्य धन्य तव जननी कह अंगद हनुमान ।।

राम बचन सुनि बिहँसा मोहि सिखावत ग्यान ।
बयरु करत नहिं तब डरे अब लागे प्रिय प्रान ।।

राम कृपा करि सूत उठावा । तब प्रभु परम क्रोध कहुँ पावा ।।
राम बिमुख सठ चहसि संपदा । अस कहि हनेसि माझ उर गदा ।।
राम सुभाव सुमिरि बैदेही । उपजी बिरह बिथा अति तेही ।।
राम बिमुख अस हाल तुम्हारा । रहा न कोउ कुल रोवनिहारा ।।
रामाकार भए तिन्ह के मन । मुक्त भए छूटे भव बंधन ।।
राम सरिस को दीन हितकारी। कीन्हे मुकुत निसाचर झारी।।

राम बिरह सागर मँह भरत मगन मन होत ।
बिप्र रूप धरि पवनसुत आइ गयउ जनु पोत ।।

राम प्रान प्रिय नाथ तुम्ह सत्य बचन मम तात
पुनि पुनि मिलत भरत सुनि हरष न हृदयँ समात ।।

राम कहा सेवकन्ह बुलाई । प्रथम सखन्ह अन्हवावहु जाई।
राम बाम दिसि सोभति रमा रूप गुन खानि ।
देखि मातु सब हरषीं जन्म सुफल निज जानि ।।

राम बिलोकनि बोलनि चलनी । सुमिरि सुमिरि सोचत हँसि मिलनी ।।
राम राज बैठे त्रैलोका । हरषित भए गए सब सोका ।।
राम भगति रत नर अरु नारी । सकल परम गति के अधिकारी ।।

राम राज नभगेस सुनु सचराचर जग माहिं ।
काल कर्म सुभाव गुन कृत दुख काहुहि नाहिं ।।

राम राज कर सुख संपदा । बरनि न सकइ फनीस सारदा ।।
राम करहिं भ्रातन्ह पर प्रीती । नाना भाँति सिखावहिं नीती ।।
राम कथा मुनिबर बहु बरनी । ग्यान जोनि पावक जिमि अरनी ।।
राम सुनहु मुनि कह कर जोरी । कृपासिंधु बिनती कछु मोरी ।।
राम चरित सत कोटि अपारा । श्रुति सारदा न बरनै पारा ।।
राम अनंत अनंत गुनानी । जन्म कर्म अनंत नामानी ।।
राम चरित जे सुनत अघाहीं । रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं ।।

राम परायन ग्यान रत गुनागार मति धीर ।
नाथ कहहु केहि कारन पायउ काक सरीर  ।।

राम चरित बिचित्र बिधि नाना। प्रेम सहित कर सादर गाना।
राम भगति पथ परम प्रबीना । ग्यानी गुन गृह बहु कालीना।।
राम कथा सो कहइ निरंतर । सादर सुनहिं बिबिधि बिहंगबर ।।
राम कृपाँ तव दरसन भयऊ।तव प्रसाद सब संसय गयऊ।

राम कृपा भाजन तुम्ह ताता । हरि गुन प्रीति मोहि सुखदाता ।।
राम कृपा आपनि जड़ताई ।कहउँ खगेस सुनहु मन लाई ।।

रामचंद्र के भजन बिनु जो चह पद निर्वान ।
ग्यानवंत अपि सो नर पसु बिनु पूँछ बिषान ।।

राम उदर देखेउँ जग नाना । देखत बनइ न जाइ बखाना ।।
राम प्रसाद भगति बर पायउँ । प्रभु पद बंदि निजाश्रम आयउँ ।।
राम कृपा बिनु सुनु खगराई । जानि न जाइ राम प्रभुताई ।।
राम भजन बिनु मिटहिं न कामा । थल बिहीन तरु कबहुँ कि जामा ।।
रामु काम सत कोटि सुभग तन । दुर्गा कोटि अमित अरि मर्दन ।।

रामु अमित गुनसागर थाह कि पावइ कोइ ।
संतन्ह सन जस किछु सुनेउँ तुम्हहि सुनायँउ सोइ ।।

राम चरित सर सुंदर स्वामी । पायहु कहाँ कहहु नभगामी।राम बिमुख लहि बिधि सम देही । कबि कोबिद न प्रसंसहि तेही ।।
राम भगति एहिं तन उर जामी। ताते मोहि परम प्रिय स्वामी ।।
रामहि भजहिं तात सिव धाता।नर पावँर कै केतिक बाता।।
राम चरन बारिज जब देखौं । तब निज जन्म सफल करि लेखौं ।।

राम भगति जल मम मन मीना । किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना ।।
रामचरित सर गुप्त सुहावा । संभु प्रसाद तात मैं पावा ।।
राम भगति जिन्ह के उर नाहीं । कबहुँ न तात कहिअ तिन्ह पाही ।।
राम भगति अबिरल उर तोरे । बसिहि सदा प्रसाद अब मोरे
राम रहस्य ललित बिधि नाना। गुप्त प्रगट इतिहास पुराना।।
राम भगति निरुपम निरुपाधी । बसइ जासु उर सदा अबाधी ।।
राम भजत सोइ मुकुति गोसाई । अनइच्छित आवइ बरिआई ।।
राम भगति चिंतामनि सुंदर । बसइ गरुड़ जाके उर अंतर।।

राम भगति मनि उर बस जाके । दुख लवलेस न सपनेहुँ ताके ।।
राम सिंधु घन सज्जन धीरा । चंदन तरु हरि संत समीरा ।।
राम कृपाँ नासहिं सब रोगा । जौं एहि भाँति बनै संजोगा ।।
राम चरन नूतन रति भई । माया जनित बिपति सब गई ।।
राम कथा के तेइ अधिकारी । जिन्ह के सत संगति अति प्यारी ।।

राम चरन रति जो चह अथवा पद निर्बान ।
भाव सहित सो यह कथा करउ श्रवन पुट पान ।।

राम कथा गिरिजा मैं बरनी । कलि मल समनि मनोमल हरनी ।।
राम उपासक जे जग माहीं । एहि सम प्रिय तिन्ह के कछु नाहीं ।।

                   जय श्री राम

संकलन कर्ता
डॉ विदुषी शर्मा

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